बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में 30 जून तक अवकाश घोषित कर दिया गया है लेकिन शिक्षक और शिक्षिकाओें को स्कूल आना होगा। अब ऐसी स्थिति में उन विरान स्कूलों में जो खेतों के बीच हैं वहां शिक्षिकाओं की सुरक्षा को कौन जिम्मेदार होगा?
हम इंटरनेट और संचार क्रांति के इस दौर में भले ही जी रहे हों लेकिन महिलाओं के प्रति सोच वही दशकांे पुरानी हैं अपनी अस्मत को बचाए रखना महिलाओं के लिए पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों मंे ग्रीष्मकालीन अवकाश 15 जून से बढ़ाकर 30 जून तक कर दिया गया है लेकिन शिक्षक और शिक्षिकाओं को 16 जून से स्कूल में उपस्थित होने के आदेश दिए गए हैं। अब प्रश्न यह है कि टीचर्स स्कूल में आकर क्या करेंगे? तमाम स्कूलों में शिक्षिकाएं ही तैनात हैं और बच्चों के सहारे उनकी सुरक्षा भी हो जाती है असामाजिक तत्वों की हिम्मत स्कूल मंे आने की नहीं होती है। सूबे में ऐसे स्कूल भी हैं जो खेतों के बीच स्थित हैं इन वीरान स्कूलों मंे शिक्षिकाओं के साथ कोई भी अनहोनी हो सकती है। इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
इस संबंध में लखनऊ और प्रयागराज शिक्षा विभाग के उच्च पदस्थ अधिकारियों से बात की तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।
इसका समाधान केवल यह है कि जब स्कूलों मंे बच्चों का अवकाश किया जाए तो टीचर्स का भी अवकाश होना चाहिए। अगर कोई जरूरी काम या अभियान संचालित करना है तो बुलाया जाए अन्यथा नहीं। टीचर्स को कर्मचारियों के नजरिए से देखना तर्कसंगत नहीं है। हालांकि इस संबंध में विभिन्न शिक्षक संगठनों ने आवाज उठाई है।
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