लखनऊ। छात्रों से वसूली गई फीस उनके कल्याण पर खर्च करने की बजाए दूसरे कार्यों पर खर्च की जा रही है। अशासकीय सहायता प्राप्त (एडेड) डिग्री कॉलेजों में निर्धन छात्र शुल्क, क्रीड़ा शुल्क, पत्रिका शुल्क व अन्य शुल्क जो छात्र निधि में आते हैं उनसे नए भवन निर्माण, नए संकाय खोलने और नैक मूल्यांकन पर खर्च किए जा रहे हैं। प्राचार्यों पर दबाव बनाकर प्रबंधक मनमाने ढंग से इसका उपयोग कर रहे हैं। प्रधानाचार्य परिषद की शिकायत के बाद उच्च शिक्षा विभाग ने कमेटी गठित की और दोनों के बीच शुल्क खर्च की सीमा रेखा तय कर दी है।
वसूली गई फीस में छात्र कल्याण के मदों की धनराशि से क्रीड़ा मैदान के लिए जमीन खरीदने,मेधावी छात्रों के सम्मान, शौचालय व पेयजल इत्यादि की व्यवस्था पर खर्च किया जा सकता है। प्रबंधतंत्र इसका उपयोग नया वाहन खरीदने, नया संकाय खोलने के लिए कमेटी की विजिट, भवनों का विस्तार और उपकरण खरीदने पर खर्च नहीं कर सकता। फिर भी मनमाने ढंग से शुल्क की धनराशि खर्च की जा रही है। फिलहाल, शासन के निर्देश पर उच्च शिक्षा निदेशालय की ओर से छह सदस्यीय कमेटी गठित की गई और उसने तय किया कि छात्र निधि की धनराशि के खर्च के लिए एक व उससे अधिक परामर्शदात्री समिति गठित की जाए और उसमें 50 प्रतिशत छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। उप्र प्रधानाचार्य परिषद के अध्यक्ष डॉ. अनिल मिश्रा व महामंत्री डॉ. उदयन मिश्रा के प्रत्यावेदन पर यह कदम उठाया गया है।
फीस का बड़ा हिस्सा परीक्षा शुल्क में जा रहा
बीएससी के रेग्युलर कोर्स की फीस 4008 रुपये वार्षिक है। जिसमें से 1750 रुपये प्रति सेमेस्टर परीक्षा शुल्क है। पूरी फीस साल में एक बार और परीक्षा शुल्क दो बार मिलाकर 3450 रुपये छात्र को देने होंगे। यही हाल बीए का है। ऐसे में कॉलेजों के पास समिति धनराशि ही रह जाती है। विकास नहीं हो पाता।
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