इंचार्ज हेडमास्टर को हेडमास्टर का वेतन देने का मामला : सरकार की SLP – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

primarymaster.in


 

*इंचार्ज हेडमास्टर को हेडमास्टर का वेतन देने का मामला : सरकार की SLP*

ट्रांसलेट बाय *राहुल पांडे अविचल*

*सारांश (SYNOPSIS)*

वर्तमान विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) दिनांक 30.04.2025 को माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पारित अंतिम निर्णय और आदेश के विरुद्ध दायर की जा रही है, जिसके द्वारा विशेष अपील संख्या 652/2024 एवं संबद्ध अपीलों को खारिज करते हुए, उच्च न्यायालय ने उत्तरदाताओं तथा अन्य सहायक अध्यापकों, जो उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा बोर्ड (आगे “बोर्ड” कहा जाएगा) द्वारा संचालित एवं प्रशासित विद्यालयों में कार्यरत हैं, को प्रधानाध्यापक का वेतन पाने का हकदार माना है।

प्रारंभ में ही यह निवेदन किया जाता है कि खंडपीठ ने ऐसे व्यक्तियों को प्रधानाध्यापक का वेतन देने का निर्देश देते समय यह भी नहीं पाया कि किसी भी प्रशासनिक आदेश द्वारा इन व्यक्तियों को प्रधानाध्यापक का कार्यभार सौंपा गया था। स्पष्ट रूप से कहा जाता है कि उन सभी सहायक अध्यापकों, जो रिट याचिका में थे, में से किसी के भी पक्ष में प्रधानाध्यापक का कार्यभार सौंपने का कोई प्रशासनिक आदेश कभी पारित नहीं किया गया था, और केवल संबंधित बैंक में बैंक खाते के संचालन के लिए हस्ताक्षरों के सत्यापन के आधार पर ही उन रिट-याचिकाकर्ताओं ने स्वयं को प्रधानाध्यापक के कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वहन करने का दावा किया।

उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता/राज्य का यह तर्क भी अस्वीकार कर दिया कि राज्य के कई विद्यालयों में बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) की धारा 25 और उसके अनुसूची के अनुसार प्रधानाध्यापक की आवश्यकता ही नहीं है। अनुसूची, जो छात्र-शिक्षक अनुपात का प्रावधान करती है, केवल उन विद्यालयों में प्रधानाध्यापक का पद आवश्यक करती है जहां छात्र संख्या एक निश्चित सीमा से अधिक हो (अर्थात कक्षा 1 से 5 में 150 से अधिक छात्र, और कक्षा 6 से 8 में 100 से अधिक छात्र)। RTE अधिनियम, 2009 एक केंद्रीय कानून है और इस विषय में सर्वोच्च है।

उच्च न्यायालय का यह तर्क कि विद्यालय प्रधानाध्यापक के बिना कार्य नहीं कर सकता, RTE अधिनियम के अक्षर और भाव दोनों के विपरीत है, जो ऐसी स्थिति की परिकल्पना करता है कि कम छात्र संख्या वाले विद्यालय में प्रधानाध्यापक आवश्यक नहीं है। इस प्रकार, याचिकाकर्ता/राज्य को प्रधानाध्यापक का पद न भरने का अधिकार है, भले ही ऐसा पद स्वीकृत हो।

उच्च न्यायालय को यह नहीं देखना चाहिए था कि धारा 25 और अनुसूची RTE अधिनियम व्यवहारिक या व्यावहारिक हैं या नहीं, और इस संदर्भ में आदेश के पैरा 15 में की गई टिप्पणियां पूरी तरह से अस्थिर हैं। RTE अधिनियम के प्रावधानों को कभी चुनौती नहीं दी गई थी, और पैरा 15 में यह कहना कि कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, बिल्कुल अस्वीकार्य है।

यह स्थापित कानून है कि रिक्तियों को भरने का निर्णय प्रशासनिक होता है, और इस प्रकार की रिक्तियों को भरने का कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता, विशेषकर तब जब कोई दुर्भावना (mala fide) आरोपित न हो।

इसके अलावा, यह भी उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया था कि RTE अधिनियम की धारा 23(1) के अंतर्गत न्यूनतम योग्यता निर्धारित करने के लिए अधिसूचित “शैक्षणिक प्राधिकारी” (Academic Authority) राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) है, जिसने इस माननीय न्यायालय के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा है कि जो अध्यापक शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की योग्यता नहीं रखते, वे प्रधानाध्यापक पद पर पदोन्नति के लिए पात्र नहीं हैं। ऐसी परिस्थिति में, जब उच्च न्यायालय के समक्ष किसी भी रिट-याचिकाकर्ता के पास उक्त TET योग्यता नहीं थी, और वे प्रधानाध्यापक पद पर नियुक्ति के लिए पात्र भी नहीं थे, उच्च न्यायालय को ऐसे व्यक्तियों को प्रधानाध्यापक का वेतन देने का निर्देश नहीं देना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 में इंचार्ज/अस्थायी (officiating) प्रधानाध्यापक नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है, जबकि राज्य के माध्यमिक शिक्षा अधिनियम (U.P. Secondary Education Service Selection Board Act, 1982) में धारा 18 के अंतर्गत अस्थायी प्रधानाचार्य नियुक्ति का प्रावधान है, और राज्य के अधीनस्थ महाविद्यालयों में [संविधान 10B के अंतर्गत] अस्थायी प्राचार्य नियुक्त करने का प्रावधान है।

ऐसी परिस्थिति में, माननीय एकल पीठ और खंडपीठ—दोनों ने—पूर्ण पीठ के निर्णय जय प्रकाश नारायण सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2014) 8 ADJ 617: (2014) 6 All LJ 668 (FB) को लागू करने में गंभीर त्रुटि की, जबकि वह निर्णय उन कानूनों के संदर्भ में था जिनमें अस्थायी/अंतरिम व्यवस्था का प्रावधान था। वर्तमान मामले में न तो विधानमंडल ने कोई अस्थायी व्यवस्था का प्रावधान किया है और न ही किसी रिट-याचिकाकर्ता को प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यभार सौंपने का कोई आदेश है।

इसके विपरीत, RTE अधिनियम ऐसी स्थिति का भी अनुमान करता है जहां प्रधानाध्यापक का पद रिक्त रह सकता है। अतः कई रिट-याचिकाकर्ताओं का, जो अपने विद्यालय में वरिष्ठतम शिक्षक भी नहीं हैं, यह आग्रह कि वे इंचार्ज प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य कर रहे हैं और प्रधानाध्यापक का वेतन पाने के हकदार हैं, पूरी तरह से निराधार और विधि-विरुद्ध है।

इसके अतिरिक्त, राज्य में प्राथमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापक पदों को भरे जाने में बाधा यह भी है कि—

(i) TET योग्यता अनिवार्य है या नहीं, यह प्रश्न वर्तमान में इस माननीय न्यायालय में सिविल अपील संख्या 1385/2025 में विचाराधीन है, जिसमें निर्णय सुरक्षित रखा गया है, और 

(ii) लगभग सभी विद्यालयों में वरिष्ठता विवाद लंबित है।

इस प्रकार, किसी भी दृष्टिकोण से उच्च न्यायालय द्वारा प्रधानाध्यापक का वेतन देने का निर्देश अनुचित और अस्थिर है, जिसे निरस्त किया जाना आवश्यक है। अतः यह विशेष अनुमति याचिका अंतरिम राहत की प्रार्थना सहित प्रस्तुत की जा रही है।

*तिथियों एवं घटनाओं की सूची (LIST OF DATES)*

04.11.2022 – उत्तरदाता विभिन्न बेसिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक के रूप में कार्यरत थे। स्वयं को प्रधानाध्यापक का कार्य करते हुए बताकर और जय प्रकाश नारायण सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (पूर्ण पीठ) के निर्णय के आधार पर, उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रिट याचिका (Writ-A No. 18228/2022) दायर की, जिसमें प्रधानाध्यापक का वेतन देने की मांग की गई।

18.01.2023 – राज्य सरकार ने प्रतिवाद-पत्र (Counter Affidavit) दाखिल कर कहा कि पूर्ण पीठ का उपरोक्त निर्णय लागू नहीं होता तथा वरिष्ठता सूची विवादित है, इसलिए याचिकाकर्ता अपने विद्यालय में वरिष्ठतम नहीं हैं।

07.05.2023 – याचिकाकर्ताओं ने प्रत्युत्तर-पत्र (Rejoinder Affidavit) दाखिल कर स्वयं को वरिष्ठतम बताते हुए अपने पदोन्नति क्रम का उल्लेख किया।

11.03.2024 – अन्य रिट याचिकाओं (Writ-A No. 36240/2015 एवं संबद्ध) में वरिष्ठता सूची को चुनौती दी गई, जिन्हें उच्च न्यायालय ने आपत्तियां दाखिल करने के निर्देश के साथ निस्तारित किया।

07.05.2024 एवं 15.05.2024 – माननीय एकल पीठ ने, वरिष्ठता विवाद पर विचार किए बिना, यह कहते हुए कई रिट याचिकाएं स्वीकार कीं कि जो व्यक्ति उच्च पद पर कार्य करता है, वह उस पद का वेतन पाने का अधिकारी है।

17.07.2024 – राज्य एवं बोर्ड ने उक्त आदेशों के विरुद्ध खंडपीठ में विशेष अपील (Special Appeal No. 652/2024) और स्थगन प्रार्थना-पत्र दायर किए।

04.09.2024 – अपील लंबित रहने के दौरान, राज्य ने पूरक हलफनामा दाखिल कर RTE अधिनियम, कम छात्र संख्या, वरिष्ठता विवाद और TET योग्यता की कमी का उल्लेख किया।

27.02.2025 – सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील संख्या 1385/2025 में NCTE से हलफनामा मांगा कि क्या TET अनिवार्य है।

05.03.2025 – NCTE ने हलफनामा दाखिल कर कहा कि सभी शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य है, चाहे वे पहले से नियुक्त हों।

20.04.2025 – राज्य ने उच्च न्यायालय के समक्ष NCTE के रुख का उल्लेख करते हुए एक और पूरक हलफनामा दाखिल किया।

30.04.2025 – उच्च न्यायालय ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार की, किंतु प्रधानाध्यापक का वेतन (सीमित अवधि के लिए) देने का निर्देश बरकरार रखा।

28.07.2025 – वर्तमान विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई।

*विशेष अनुमति याचिका (SPECIAL LEAVE PETITION)*

(अनुच्छेद 136, भारत का संविधान, के अंतर्गत)

*याचिकाकर्ता:*

1. उत्तर प्रदेश राज्य

2. उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद

उत्तरदाता:

1. त्रिपुरारी दुबे

2. अन्य संबंधित पक्ष

सर्वाधिक विनम्रता से याचिकाकर्ता निम्नलिखित निवेदन करते हैं:

*1. आदेश को चुनौती*

यह विशेष अनुमति याचिका माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ, द्वारा दिनांक 30.04.2025 को विशेष अपील संख्या 652/2024 एवं अन्य संबद्ध अपीलों में पारित अंतिम निर्णय एवं आदेश को चुनौती देती है। उक्त आदेश के द्वारा माननीय खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेशों को यथावत रखते हुए, उत्तरदाताओं/याचिकाकर्ताओं (जो विभिन्न प्राथमिक/उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक हैं) को प्रधानाध्यापक का वेतन देने का निर्देश दिया है।

*2. पृष्ठभूमि*

2.1 उत्तरदाताओं का दावा था कि वे विद्यालयों में वरिष्ठतम सहायक अध्यापक होने के कारण प्रधानाध्यापक का कार्य देख रहे हैं और इस प्रकार उन्हें उस पद का वेतन मिलना चाहिए।

2.2 माननीय एकल पीठ ने जय प्रकाश नारायण सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (पूर्ण पीठ निर्णय) के आधार पर यह कहते हुए याचिकाएं स्वीकार कर लीं कि “जो व्यक्ति उच्च पद पर कार्य करता है, वह उस पद का वेतन पाने का अधिकारी है।”

2.3 याचिकाकर्ता/राज्य का तर्क था कि—

किसी भी उत्तरदाता को प्रशासनिक आदेश द्वारा प्रधानाध्यापक का कार्यभार नहीं दिया गया।

विद्यालयों में छात्र संख्या RTE अधिनियम, 2009 की सीमा से कम है, इसलिए प्रधानाध्यापक का पद आवश्यक नहीं।

अधिकांश विद्यालयों में वरिष्ठता विवाद लंबित है।

उत्तरदाता TET उत्तीर्ण नहीं हैं, जबकि NCTE के अनुसार प्रधानाध्यापक पद के लिए TET अनिवार्य है।

U.P. Basic Education Act, 1972 में ‘इंचार्ज’/‘ऑफिसिएटिंग’ प्रधानाध्यापक नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।

2.4 इन सभी तर्कों को उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अस्वीकार कर दिया।

*3. विधिक प्रश्न (QUESTIONS OF LAW)*

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचारार्थ निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उठते हैं—

i. क्या माननीय उच्च न्यायालय यह सही ठहराने में सही था कि बिना किसी प्रशासनिक आदेश के, केवल बैंक हस्ताक्षर के आधार पर, सहायक अध्यापक प्रधानाध्यापक का वेतन पाने के हकदार हैं?

ii. क्या माननीय उच्च न्यायालय ने RTE अधिनियम, 2009 की धारा 25 और अनुसूची की गलत व्याख्या की है, जिसमें कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में प्रधानाध्यापक का पद अनिवार्य नहीं माना गया है?

iii. क्या माननीय उच्च न्यायालय NCTE द्वारा निर्धारित न्यूनतम योग्यता (TET उत्तीर्ण) की अनदेखी करते हुए प्रधानाध्यापक का वेतन देने का निर्देश दे सकता है?

iv. क्या U.P. Basic Education Act, 1972 में प्रावधान न होते हुए भी, ‘इंचार्ज’ या ‘ऑफिसिएटिंग’ प्रधानाध्यापक के आधार पर वेतन देने का आदेश विधि-सम्मत है?

v. क्या उच्च न्यायालय द्वारा जय प्रकाश नारायण सिंह (पूर्ण पीठ) का निर्णय लागू करना उचित था, जबकि वह अलग कानून के संदर्भ में था जिसमें अस्थायी नियुक्ति का प्रावधान है?

*4. आधार (GROUNDS)*

4.1 उच्च न्यायालय ने यह मानने में त्रुटि की कि बिना किसी प्रशासनिक आदेश या वैधानिक प्रावधान के भी सहायक अध्यापक प्रधानाध्यापक का वेतन पाने के हकदार हैं।

4.2 RTE अधिनियम, 2009 की धारा 25 और अनुसूची स्पष्ट रूप से कहती है कि कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में प्रधानाध्यापक की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी इस प्रावधान को दरकिनार किया गया।

4.3 NCTE द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार TET उत्तीर्ण होना प्रधानाध्यापक पद के लिए अनिवार्य है; उत्तरदाताओं के पास यह योग्यता नहीं है।

4.4 U.P. Basic Education Act, 1972 में ‘इंचार्ज’ प्रधानाध्यापक का कोई प्रावधान नहीं, फिर भी न्यायालय ने ऐसा वेतन देने का आदेश दिया।

4.5 जय प्रकाश नारायण सिंह का पूर्ण पीठ निर्णय भिन्न संदर्भ और कानून पर आधारित था; उसका यहां प्रयोग गलत है।

4.6 आदेश से सरकारी खजाने पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ेगा और यह लोकहित के प्रतिकूल है।

*प्रार्थना (PRAYER)*

उपरोक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए, याचिकाकर्ता अत्यंत विनम्रतापूर्वक इस माननीय न्यायालय से प्रार्थना करते हैं कि—

a) माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ, द्वारा दिनांक 30.04.2025 को विशेष अपील संख्या 652/2024 एवं अन्य संबद्ध अपीलों में पारित आदेश/निर्णय को निरस्त/स्थगित करने की अनुमति प्रदान की जाए;

b) अंतरिम आदेश के रूप में, इस माननीय न्यायालय द्वारा उक्त आदेश के संचालन पर रोक लगाई जाए, ताकि राज्य को प्रधानाध्यापक का वेतन भुगतान करने के लिए बाध्य न किया जाए और अवमानना कार्यवाही से बचा जा सके;

c) इस माननीय न्यायालय को उचित और न्यायसंगत प्रतीत होने वाले अन्य आदेश पारित करने की कृपा हो।

Basic Shiksha Khabar | PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News | Primarykamaster | Updatemarts | Primary Ka Master | Basic Shiksha News | Uptet News | primarykamaster | SHIKSHAMITRA

Leave a Comment