डॉलर के सामने रुपया धड़ाम! पहली बार ₹92 के पार पहुंचा, कच्चे तेल और युद्ध ने बढ़ाई चिंता, जानिए पूरी वजह – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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रुपये पर दबाव: डॉलर के मुकाबले 92 के पार पहुंची भारतीय मुद्रा, बाजार में बढ़ी चिंता

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। शेयर बाजार में गिरावट के साथ-साथ भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गया है। बुधवार को शुरुआती कारोबार में रुपया करीब 71 पैसे गिरकर 92.18 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया, जो अब तक का नया निचला स्तर माना जा रहा है। यह 21 जनवरी के बाद रुपये में सबसे बड़ी गिरावट बताई जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, एशियाई मुद्राओं के मुकाबले भी रुपया इस दौरान सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल रहा। वहीं डॉलर इंडेक्स, जो प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति को दर्शाता है, लगभग 0.3% बढ़कर 99.33 तक पहुंच गया।

वैश्विक तनाव से सुरक्षित निवेश की ओर रुख

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण निवेशकों का रुख सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे माहौल में कई वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सोना और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड जैसे सुरक्षित साधनों में निवेश कर रहे हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे बाजारों और भारतीय रुपये पर पड़ रहा है।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर

पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, जिससे भारतीय बाजार का मूड भी कमजोर हुआ है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर अर्थव्यवस्था और मुद्रा पर पड़ता है।

सरकार ने तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता कम करने के लिए भरोसा दिया है कि सप्लाई बाधित नहीं होगी। यदि मध्य-पूर्व से आपूर्ति में रुकावट आती है तो रूस जैसे अन्य स्रोतों से कच्चा तेल मंगाने पर भी विचार किया जा सकता है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी कारण

रुपये पर दबाव बढ़ने का एक कारण विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार बिकवाली भी माना जा रहा है। हाल के कारोबारी सत्र में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने लगभग 3,300 करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जिससे इस साल अब तक उनकी कुल बिकवाली करीब 19,000 करोड़ रुपये (लगभग 2.1 अरब डॉलर) तक पहुंच गई है।

भारत के लिए क्यों बढ़ जाती है चिंता

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में वैश्विक तेल कीमतों में तेजी से देश का आयात बिल बढ़ता है, जिससे चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और महंगाई पर भी दबाव बनता है।

इसके अलावा, अगर निवेशक जोखिम से बचने के लिए उभरते बाजारों से पैसा निकालते हैं, तो भारतीय शेयर बाजार और रुपये दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।

आगे क्या हो सकता है असर

करेंसी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबा चलता है तो मध्य-पूर्व से आने वाले निवेश और रेमिटेंस पर भी असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में भारत के मैक्रोइकोनॉमिक संकेतकों पर दबाव बढ़ने, महंगाई में तेजी, रुपये की कमजोरी और आर्थिक वृद्धि दर पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

📊 कुल मिलाकर, वैश्विक हालात और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव फिलहाल भारतीय मुद्रा और बाजार के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

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