नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को पितृत्व अवकाश के लिए एक ठोस कानून बनाने पर विचार करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि बच्चे की देखभाल सिर्फ मां की जिम्मेदारी नहीं है और पिता की उपस्थिति बच्चे के मानसिक-भावनात्मक विकास के लिए जरूरी है।
पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता दे: सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार को एक ऐसा कानून बनाना चाहिए, जो पितृत्व अवकाश को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता दे। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अवकाश की अवधि इस तरह तय की जानी चाहिए जो माता-पिता और बच्चे की जरूरतों के अनुरूप हो। शीर्ष अदालत ने यह सिफारिश एक ऐसे मामले में की, जो उस प्रावधान की संवैधानिकता से जुड़ा था, जिसके तहत गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व अवकाश तभी दिया जाता था, जब गोद लिए गए बच्चे की उम्र तीन महीने से कम हो।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी महिला के गर्भ से पैदा हुए बच्चे और गोद लिए गए बच्चे में कोई अंतर नहीं है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश से वंचित करना असंवैधानिक है।
हंसानंदिनी ने 2021 में दाखिल की थी याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने अब तक दो बच्चों को गोद ले चुकीं हंसानंदिनी नंदूरी की ओर से 2021 में दाखिल याचिका पर यह फैसला दिया। उन्होंने याचिका में मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 की धारा 5(4) की वैधानिकता को चुनौती दी थी। मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के इस प्रावधान में सरकार ने 2017 में संशोधन किया, जिसके तहत गोद लेने वाली मां को 12 सप्ताह का अवकाश का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसमें यह शर्त जोड़ दी गई कि अवकाश तभी मिलेगा, जब गोद लिए गए बच्चे की उम्र तीन माह से कम हो। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 12 नवंबर, 2024 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। केंद्र सरकार ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 नवंबर 2025 लागू कर दी। इसमें भी वही पुराना नियम रखा गया ।
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