उत्तर प्रदेश के 19 जिलों की 51 आर्द्रभूमियों को योगी सरकार अधिसूचित करवाने जा रही है। यूपी राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण की 6वीं बैठक में सोमवार को इसका फैसला लिया गया। बैठक की अध्यक्षता वन मंत्री अरुण कुमार सक्सेना ने की।
बैठक में तय किया गया कि नमामि गंगे परियोजना के तहत 14 गंगा जिलों- अलीगढ, बदायूं, कासगंज, प्रयागराज, कानपुरनगर, चन्दौली, फर्रुखाबाद, उन्नाव, भदोही, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, बलिया, बिजनौर और अमरोहा में 750 हेक्टेअर में फैली 23 आर्द्रभूमियों को आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के प्रावधानों के तहत अधिसूचित करवाया जाएगा।
वहीं, महराजगंज, बलरामपुर, अयोध्या, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर स्थित 1130.653 हेक्टेअर में फैली कुल 28 आर्द्रभूमियों को भी इसी नियम के तहत अधिसूचित करवाया जाएगा। पूर्व में एक आर्द्रभूमि अधिसूचित है। नौ जिलों की 50 आर्द्रभूमियों में से 20 आर्द्रभूमियों को आरंभिक स्तर पर अधिसूचित किया जा चुका है। शेष 30 आर्द्रभूमियों की आंरभिक अधिसूचना की कार्रवाई प्रचलित है।
बैठक में वन एवं पर्यावरण विभाग की प्रमुख सचिव वी. हेकाली झिमोमी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक और विभागाध्यक्ष सुनील चौधरी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन्यजीव/मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक अनुराधा वेमूरी, वन विभाग की सचिव बी. चन्द्रकला, आदि उपस्थित रहे।
आर्द्रभूमि का महत्व
जानकारों के मुताबिक आर्द्रभूमि या वेटलैंड हमारे भूदृश्य के वे भाग हैं जो जल की उपस्थिति से परिभाषित होते हैं। यहां की मिट्टी में नमी होती है और यह अत्यधिक जैव विविधता वाला, उत्पादक पारिस्थितिक तंत्र होता है। आर्द्रभूमि न केवल जलीय पक्षीयों का आश्रय स्थल होती हैं बल्कि भूजल संरक्षण, जल शुद्धिकरण, बाढ़ नियंत्रण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हर साल दो फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाता है।
इसकी वजह यह है कि इसी दिन 1971 में ईरान के रामसर शहर में रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए गए थे। यह अंतरराष्ट्रीय समझौता विश्व की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग के लिए बनाया गया था। भारत भी इस कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता है। देश में कई आर्द्रभूमियां रामसर साइट के रूप में घोषित की जा चुकी हैं।
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