लखनऊ। जिस स्क्रीन को हमने बच्चों को बहलाने का आसान जरिया समझा, वही अब उनके बचपन को चुपचाप निगल रही है। घरों में मां की लोरी की जगह बच्चों का स्क्रीन टाइम ले चुका है। इसकी कीमत मासूम अपनी भाषा, व्यवहार और सामाजिक जुड़ाव खोकर चुका रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, मोबाइल और टीवी स्क्रीन की बढ़ती संगत बच्चों को ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ की ओर धकेल रही है, जहां बच्चा अपनों के बीच रहकर भी उनसे कटता चला जाता है।
अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में ऑटिज्म बीमारी जैसे लक्षण नजर आ रहे हैं। बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे अस्पताल पहुंच रहे हैं। बच्चे सबसे अधिक वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार हो रहे हैं। अकेले केजीएमयू की ओपीडी में बीते एक वर्ष में आए तीन से 10 साल तक के 100 बच्चों में इसकी पुष्टि हुई है। रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टरों ने 40 बच्चों में ऑटिज्म की पुष्टि की, बाकी 60 बच्चे वर्चुअल ऑटिज्म के शिकार मिले। लखनऊ, गोरखपुर, आगरा, वाराणसी, प्रयागराज और बरेली मंडलों में ऑटिज्म के शिकार बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इन जिलों में ऐसे 15,569 बच्चे पंजीकृत हैं। आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में हर साल 900 बच्चे और गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में रोजाना 70-75 बच्चे पहुंच रहे हैं।
इन बातों का रखें ख्याल
● बच्चों का स्क्रीन टाइम घटाएं।
● खेलने और दूसरे बच्चों संग समय बिताने को प्रोत्साहित करें।
● परिवारिक आयोजन, रिश्तेदारों दोस्तों के परिवार से मेलजोल में बच्चों का शामिल करें।
● सोने, खेलने का समय तय करें, उनकी गतिविधियों में शामिल हों।
● गर्भावस्था के दौरान मां का पोषण, तनाव से बचाव और जन्म के बाद बच्चे की सही देखभाल भी महत्वपूर्ण है।
● यदि लक्षण दिखें तो स्पीच थेरेपी, बिहेवियर थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी से काफी सुधार संभव है।
68 में एक मासूम शिकार
पूर्व प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी ने बताया कि औसतन हर 68वा बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित है। लड़कों में यह अधिक पाया जाता है। इसके लक्षण छह से नौ माह में ही दिखाई दे सकते हैं। ऑटिज्म में जेनेटिक्स की अहम भूमिका होती है पर माहौल और जीवनशैली भी मायने रखती हैं। परिवार में पहले से एक बच्चे को ऑटिज्म है, तो दूसरे बच्चें में खतरा कई गुना तक बढ़ जाता है।
एकाग्रता की कमी
केजीएमयू के मानसिक स्वास्थ्य विभाग के अध्यक्ष डॉ. विवेक अग्रवाल ने बताया कि बच्चे मोबाइल, कंप्यूटर में खोए रहते हैं। इससे वे वर्चुअल ऑटिज्म के शिकार हो रहे हैं। तेज रोशनी, चमकीले रंग और लगातार बदलते दृश्य-आवाज बच्चों के दिमाग के विकास को प्रभावित कर रहे हैं। इससे बच्चों में एकाग्रता की कमी, चिड़चिड़ापन, असामान्य व्यवहार सामने आ रहे हैं।
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