नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि उसके संचालन के लिए कोई ढांचा न हो। प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसी संस्थाओं के कामकाज के लिए एक व्यवस्था एवं नियम होने चाहिए।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्ला, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी परंपरा के वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि दरगाह वह स्थान होता है, जहां किसी संत को दफनाया गया हो। उन्होंने कहा कि इस्लाम में मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन सूफी आस्था प्रणाली में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है। पाशा ने कहा कि मौजूदा मामला चिश्तिया व्यवस्था से जुड़ा है। मेरा कहना है कि यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से एक धार्मिक संप्रदाय है। अगर हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाओं को देखा जाए, तो उनमें रोजा, नमाज, हज और सबसे बढ़कर आस्था जैसी परंपराओं के पालन पर जोर है। उन्होंने दलील दी कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को विनियमित करने का अधिकार प्रबंधन का हिस्सा है।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की टिप्पणी
* शीर्ष अदालत ने कहा, संस्थाओं के प्रबंधन के लिए एक नियम होने चाहिए
* धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव पर सुनवाई की गई
एक व्यवस्था जरूरी
न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने कहा कि प्रबंधन के अधिकार का मतलब ढांचे का अभाव नहीं हो सकता और हर चीज के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए। न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने कहा कि ‘अराजकता नहीं हो सकती। चाहे दरगाह हो या मंदिर, संस्था से जुड़े तत्व होंगे, धार्मिक क्रियाओं का एक तरीका होगा और कार्यों के संपादन का क्रम होगा। किसी न किसी को इसे विनियमित करना होगा।’
मानकों पर भेदभाव नहीं
न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने कहा कि ‘ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई कहे कि मैं जो चाहूंगा, वह करूंगा या द्वार हर समय बिना किसी नियंत्रण के खुले रहें। इसलिए सवाल यह है कि प्रबंधन करने वाला निकाय कौन है। यहीं संरक्षण की बात आती है, क्योंकि विनियमन आवश्यक है। साथ ही यह संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता। व्यापक संवैधानिक मानकों पर भेदभाव नहीं हो सकता।’
कोई अपने हिसाब से तय नहीं कर सकता नियम
न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने कहा कि हर संस्था के लिए नियम होने चाहिए और इसे प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से तय नहीं कर सकता। इस मामले की सुनवाई जारी है। शीर्ष अदालत ने इससे पहले कहा था कि किसी धार्मिक संप्रदाय की किसी प्रथा को आवश्यक या गैर-आवश्यक घोषित करने के लिए मानदंड तय करना न्यायिक मंच के लिए अत्यंत कठिन है।
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