शिक्षकों में TET की अनिवार्यता पर सुलग रही आक्रोश की आग, संशोधित RTE कानून में भी नहीं है पात्रता परीक्षा TET का प्रावधान – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य की गई शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को लेकर एक बार फिर माहौल गर्मा गया है। इस बार शिक्षकों को तनाव देने का काम कर रहा है निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई)। कानून में केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधन में भी सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी का प्रावधान नहीं किया गया है। इसमें केवल शिक्षण प्रशिक्षण पर ही जोर दिया गया है। इस संशोधन के बाद देश भर के शिक्षक एक बार फिर आंदोलन के मूड में आ गए हैं। शिक्षक संगठनों ने केंद्र सरकार से टीईटी को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।

असल में देश के सरकारी स्कूलों के पच्चीस लाख से ज्यादा शिक्षक सुप्रीम कोर्ट द्वारा सितंबर में दिए आदेश में अनिवार्य की गई शिक्षक पात्रता परीक्षा को लेकर परेशान हैं। चार दिन पहले पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आरटीई में 2017 के संशोधन का हवाला देते हुए कहा है कि इसमें सरकार ने भी टीईटी का प्रावधान किया है। इसलिए अब किसी को छूट नहीं दी जा सकती। 

अदालत से मुंह उतार कर लौटे देश भर के शिक्षकों ने अब संशोधित आरटीई निकाल लिया है। सारे संशोधन के साथ केंद्र व राज्य सरकार द्वारा जारी राजपत्र के अलावा संशोधन प्रस्ताव पर तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा संसद में दिए गए बयान की प्रति भी शिक्षक निकालकर बैठ गए हैं। इनके आधार पर प्रदेश के शिक्षक संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के अलावा अपने अपने मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को पत्र भेजे हैं। इन पत्रों के साथ पूरा संशोधित कानून भी भेजा जा रहा है। ताकि संशोधित कानून का अध्ययन कर सरकार की ओर से अदालत को शिक्षक पात्रता परीक्षा के संबंध में हकीकत बताई जा सके।

सरकार स्पष्ट करे स्थिति

शीर्ष अदालत के आदेश के बाद देश के करीब पच्चीस लाख शिक्षकों के भविष्य पर संकट खड़ा हो गया है। अदालत ने सितंबर में दिए अपने आदेश में केवल उन शिक्षकों को पात्रता परीक्षा से छूट दी है, जिन्हें सेवानिवृत्ति के लिए पांच साल का समय बचा है। संगठन का कहना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को नई शर्तों के आधार पर असुरक्षा में डालना उचित नहीं है। इसलिए अब नए सिरे से केंद्र और राज्य सरकार को पत्र भेजा जा रहा है। इसके साथ संशोधित आरटीई की प्रति भी सभी को भेजी जा रही है। इसके बाद भी अदालत प्रशिक्षित शिक्षकों के लिए भी टीईटी की अनिवार्यता लागू करती है तो नए सिरे से रणनीति बनाकर आंदोलन तेज किया जाएगा।

संशोधित कानून में नहीं है टीईटी

शिक्षकों ने दावा किया है कि संशोधित कानून में कहीं भी पात्रता परीक्षा का प्रावधान नहीं किया गया है। 2017 में किए गए संशोधन के बाद कानून में केवल अप्रशिक्षित शिक्षकों को प्रशिक्षण और न्यूनतम अर्हता पूरी करने के लिए समयवृद्धि का प्रावधान किया गया था।  संशोधन का मूल उद्देश्य उन शिक्षकों को राहत देना था, जो 31 मार्च 2015 तक नियुक्त या कार्यरत थे लेकिन निर्धारित प्रशिक्षण अर्हता पूरी नहीं कर पाए थे। ऐसे शिक्षकों को संशोधन लागू होने के बाद चार वर्ष के भीतर डिप्लोमा इन एजुकेशन (डीएलएड) और वैचलर ऑफ एजुकेशन (बीएड) जैसी न्यूनतम शैक्षणिक अर्हताएं प्राप्त करने का अवसर दिया गया था। इसके लिए पात्रता परीक्षा का कहीं उल्लेख ही नहीं था। ऐसे में पूर्व से डीएड, बीएड धारी शिक्षकों के लिए भी पात्रता परीक्षा अनिवार्य किया जाना न्याय संगत नहीं है। यह शिक्षकों के संवैधानिक और सेवा अधिकारों पर ही सीधा आघात है।

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