प्राइवेट कॉलेज के खिलाफ भी अनु. 226 में दाखिल की जा सकती है याचिका
छह महीने का निलंबन खत्म पर छात्र को परीक्षा में बैठने की अनुमति दी
, प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ बैचलर ऑफ फिजियोथेरेपी (बीपीटी) छात्र को परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी है कि चूंकि प्राइवेट कॉलेज भी शैक्षिक कार्य करते हैं, इसलिए उनके आदेश के खिलाफ अनुच्छेद 226 में याचिका सुनवाई योग्य है। न्यायमूर्ति कुनाल रवि सिंह की एकलपीठ ने अटलबिहारी वाजपेयी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध कैलाश इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग एवं पैरामेडिकल साइंसेज, गौतमबुद्ध नगर के छात्र निखिल कुमार की याचिका आंशिक तौर पर स्वीकार करते हुए कहा कि छह महीने का निलंबन पूरा हो चुका है, ऐसे में छात्र को 22 जून 2026 से होने वाली मुख्य परीक्षा में बैठने दिया जाए।
कोर्ट ने साफ किया कि प्राइवेट कॉलेज शिक्षा देने का काम करते हैं, जो सार्वजनिक कार्य है। इसलिए उनके आदेशों के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट दाखिल की जा सकती है।
याची बैच 2021-22 का छात्र है। कॉलेज की अनुशासन समिति ने उसे 16 दिसंबर 2025 को छह महीने के लिए निलंबित कर दिया था। आरोप था कि उसने एक छात्र को शारीरिक हमले की धमकी दी। शिकायत पर कॉलेज ने छात्र और उसके पिता को कारण बताओ नोटिस जारी किया। पिता ने आश्वासन दिया कि आगे ऐसा नहीं होगा, लेकिन कॉलेज ने निलंबन का आदेश दे दिया। आदेश में अपील का कोई प्रावधान नहीं था, इसलिए छात्र ने हाई कोर्ट की शरण ली तथा आठवें सेमेस्टर की परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी।
कॉलेज के वकील ने कहा कि प्राइवेट कॉलेज संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं हैं, इसलिए उनके आदेश के खिलाफ रिट नहीं चल सकती। छात्र की उपस्थिति अधूरी होने का भी तर्क दिया गया।
कोर्ट ने न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) कार्तिकेय सरन की मदद से रोयचन अब्राहम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में 2014 में हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ के निर्णय का हवाला दिया। इसमें तय हुआ था कि छह साल से ऊपर के छात्रों को उच्च शिक्षा तक पढ़ाने वाले प्राइवेट संस्थान सार्वजनिक कार्य करते हैं, इसलिए वे अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
कोर्ट ने पाया कि निलंबन आदेश 15 जून 2026 को खत्म हो चुका है। अनुशासन समिति ने छात्र को कारण बताओ नोटिस दिया था या नहीं, यह आदेश से स्पष्ट नहीं है। न ही अपील का कोई विकल्प दिया गया। कोर्ट ने कहा कि छात्र को पहले ही छह महीने निलंबित कर सजा दी जा चुकी है। अब हाजिरी कम होने के नाम पर परीक्षा से रोकना दोहरी सजा होगी।
संस्थान 18 मई 2026 के आदेश के बावजूद अनुशासनात्मक कार्रवाई के नियम भी पेश नहीं कर सका। इसलिए छात्र को बिना अनिवार्य उपस्थिति की शर्त के मुख्य परीक्षा में बैठने दिया जाए। कोर्ट की टिप्पणी थी कि निलंबन आदेश रद्द करने का मुद्दा अब “अकादमिक” रह गया है, क्योंकि सजा पूरी हो चुकी है।
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