केवल पाठ्य-पुस्तकों पर निर्भर न रहे स्कूली पढ़ाई

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केवल पाठ्य-पुस्तकों पर निर्भर न रहे स्कूली पढ़ाई

कुछ साल पहले दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय ने कक्षा छह से नौ के बच्चों के पठन-पाठन को लेकर एक सर्वेक्षण कराया था। सर्वे के नतीजों ने देश भर को चौंका दिया था। उस सर्वे ने खुलासा किया था कि राजधानी में सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले लगभग 75 फीसदी बच्चे अपनी पाठ्य-पुस्तकें ठीक से नहीं पढ़ पाते। पढ़ नहीं पाते, तो समझ नहीं पाते और तब उस पर अमल कैसे करते? शायद यही कारण है कि कक्षा 10 तक आते-आते इनमें से 40 प्रतिशत पढ़ाई छोड़ देते हैं। उनके लिए स्कूल, किताबें, परीक्षा, डिग्री महज उबाऊ या रटंत प्रक्रिया थी, जिसमें वे अपना भविष्य नहीं देखते थे।

यह मामला यहीं पर नहीं रुकता है। ये अल्प-शिक्षित या अशिक्षित लोग जब सरकारी योजनाओं को ठीक से पढ़ या समझ नहीं पाते, तो योजनाएं भ्रष्टाचार या कागजी खानापूरी की शिकार हो जाती हैं। इसमें पूरा दोष बच्चे या शिक्षक या उनके सामाजिक-आर्थिक परिवेश का नहीं है, बहुत हद तक हमारी पुस्तकों में छपे शब्द, प्रस्तुति, चित्र और तय किए गए मानक जिम्मेदार हैं। अब नई शिक्षा नीति के तहत यह जरूरी हो गया है कि अपने पढ़े को व्यावहारिकता में बदल पाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ ऐसा पढ़ना जरूरी है, जिसका कोई इम्तिहान न हो और बच्चा अपने तरीके से उससे सीखे व समझे।

स्कूल में भाषा की शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण और पढ़ाई का आधार होती है। व्यक्तित्व के विकास में भाषा एक कुंजी है। भाषा-शिक्षण का मुख्य उद्देश्य बालक को सोचने-विचारने की क्षमता प्रदान करना, उस सोच को निरंतर बनाए रखना और सरल रूप में उसे अभिव्यक्त करने का मार्ग प्रदान करना होता है। ऐसे में, छोटी-छोटी बातें कैसे उसकी रुचि को प्रभावित करती हैं, इसे यूं समझिए कि मालवी और राजस्थानी की कई बोलियो में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है और बच्चा अपने घर में वही सुनता है, लेकिन जब वह स्कूल में शिक्षक या अपनी पाठ्य-पुस्तक पढ़ता है, तो उससे संदेश मिलता है कि उसके माता-पिता ‘गलत’ उच्चारण करते हैं। कई जनजातियों की बोलियों में तो हिंदी के स्वर-व्यंजन में से एक चैाथाई होते ही नहीं हैं। ऐसे में, बच्चा जब स्कूल आता है, तब उसके सामने शब्दों का अंबार होता है, जो उसे दो नाव की सवारी करने जैसा एहसास करवाता है।

बच्चा ठीक से पढ़ सके, उसका आनंद उठाए और उसे समझ सके, इसके लिए सबसे पहले तो नीरस पुस्तकों को बदलना होगा। बच्चों को साठ फीसदी तस्वीरों वाली 12-16 पेज की छोटी कहानियों की किताबें दी जाएं, इस उम्मीद के साथ कि इसकी कोई परीक्षा नहीं होगी, तो उनमें रुचि पैदा होगी। चित्रों की अपनी भाषा होती है और रंगों का अपना आकर्षण। मनोरंजक कहानियों और चित्रों की मदद से बच्चे बहुत से शब्द पहचानने लगते हैं और उनका सहजता से अपनी पाठ्य-पुस्तक में भी इस्तेमाल करने लगते हैं। इससे सीखने और समझने की प्रक्रिया साथ-साथ चलती है। भाषा की लिपि को पहचानने, अर्थ ग्रहण करने, फिर उन शब्दों को दूसरी जगह पहचानने की प्रणाली में बच्चे तेजी से पढ़ने की दक्षता हासिल करते हैं।

असल में, पढ़ना-लिखना या शब्द पहचानना बच्चे की समझ के विकास-चक्र का महत्वपूर्ण मोड़ है, उसे नीरस पाठ्य-पुस्तकों के सहारे छोड़ना महज शिक्षा की औपचारिकता पूरा करना है। समय की मांग है कि रटंत प्रणाली को अलविदा कहा जाए। जब बच्चा सीखने, पहचानने और उसे डीकोड करने की पूरी प्रक्रिया को एक साथ अपनाकर उसमें चुनौती व आनंद ढूंढ़ने लगता है, शिक्षा उसके लिए कौतूहल बन जाती है।

प्राथमिक स्तर पर पाठ्य-पुस्तकों का वजन कम करके, रटने की पारंपरिक प्रक्रिया से परे चित्रों व शब्दों को मिलाकर अपनी कहानी गढ़ने और समझने जैसी प्रक्रिया अपनाई जाए, तो यह खेल-खेल में सीखने जैसी प्रक्रिया होगी। प्राथमिक कक्षाएं सीखने, सुनने और सहेजने की दक्षता के विकास की सबसे अहम कड़ी होती हैं। आमतौर पर इसे एकालाप मान लिया जाता है, यानी शिक्षक कहेगा और बच्चा सुनेगा। हालांकि, जब सुनने की क्षमता के विकास के लिए संवाद की पद्धति अपनाई जाती है, तब बच्चे में खुद को अभिव्यक्त करने की क्षमता का विकास होता है और यही पढ़ने का प्रारंभ है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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