यूपी पुलिस सिपाही भर्ती के अभ्यर्थियों को राहत, सरकार की अपीलें खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2018 की यूपी पुलिस कांस्टेबल (नागरिक पुलिस व पीएसी) भर्ती मामले में स्पष्ट किया कि क्षैतिज आरक्षण के तहत ओबीसी/ आरक्षित वर्ग के जिन अभ्यर्थियों ने अनारक्षित वर्ग के कटऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें चयन और नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपीलों को खारिज करते हुए दिया है। कोर्ट ने एकल पीठ के आदेशों को बरकरार रखा है।
16 नवंबर 2018 को उत्तर प्रदेश पुलिस में 31,360 नागरिक पुलिस और 18,208 पीएसी कांस्टेबल पदों की भर्ती का विज्ञापन जारी हुआ था। 2 मार्च 2020 को इसका अंतिम चयन परिणाम घोषित किया गया। Xचयन प्रक्रिया में कई ओबीसी महिला, भूतपूर्व सैनिक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित अभ्यर्थियों को यह कहकर बाहर कर दिया गया कि उन्होंने सामाजिक आरक्षण का लाभ लिया है, इसलिए वे अनारक्षित श्रेणी के क्षैतिज पदों पर चयनित नहीं हो सकते। जबकि वास्तविकता यह थी कि इन आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने अनारक्षित वर्ग के कटऑफ अंक से अधिक अंक हासिल किए थे। मूल याची अरुणा चौधरी ने 162.441 अंक हासिल किए थे जबकि अनारक्षित महिला वर्ग का कटऑफ 144.942 ही था। राज्य सरकार की दलील थी कि 2 मार्च 2020 को जब परिणाम जारी हुआ, तब अजय कुमार मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का फैसला प्रभावी था। सौरभ यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में सुप्रीम कोर्ट का फैसला 18 दिसंबर 2020 को आया था।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून भूतलक्षी प्रभाव से लागू होता है, जब तक कि शीर्ष अदालत ने स्वयं उसे केवल भविष्योन्मुखी न बनाया हो। सुप्रीम कोर्ट ने अजय कुमार मामले के सिद्धांत को अमान्य ठहराया था इसलिए मेधावी आरक्षित अभ्यर्थियों को अनारक्षित कटऑफ से अधिक अंक होने पर बाहर नहीं किया जा सकता।
सरकार द्वारा याचिकाएं देर से दाखिल करने का उठाया गया आक्षेप दरकिनार करते हुए कोर्ट ने कहा कि परिणाम मार्च 2020 में कोरोना महामारी फैलने के ठीक पहले आया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा महामारी के दौरान दी गई मियाद छूट और मामले के निरंतर विचाराधीन रहने के कारण अभ्यर्थियों को तकनीकी आधार पर न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उस समय चयन सूची तैयार करने में राज्य सरकार की कोई जानबूझकर की गई गलती नहीं थी (क्योंकि तत्कालीन निर्णय का पालन किया जा रहा था) इसलिए सफल अभ्यर्थियों को वरिष्ठता और वित्तीय/वेतन लाभ पूर्व की तारीख से नहीं, बल्कि वास्तविक नियुक्ति की तारीख से ही मिलेंगे।Xखंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को पूरी तरह सही ठहराया जिसमें सफल अभ्यर्थियों को कांस्टेबल पद पर नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश दिया गया था।
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