नई व्यवस्था: म्यूचुअल फंड में अधिक मुनाफे का मौका मिलेगा
म्यूचुअल फंड योजनाओं में पैसा लगाने वाले आम निवेशकों के लिए एक नवंबर से बड़ा बदलाव होने जा रहा है। इसके तहत अब फंड कंपनियों के पोर्टल और और ऐप्स पर ‘डायरेक्ट प्लान’ अपने आप मुख्य विकल्प (डिफाल्ट) के रूप में दिखाई देगा। यानी निवेशकों को सबसे पहले बिना किसी एजेंट या वितरक की मदद के खुद से किसी म्यूचुअल फंड योजना में सीधे निवेश करने का मौका मिलेगा।
इस कदम का उद्देश्य निवेशकों के पैसे बचाना और उन्हें कम खर्च वाली योजनाओं का सीधा फायदा देना है। इससे उनके कुल मुनाफे में अच्छी खासी बढ़ोतरी हो सकती है। बाजार नियामक सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने इस बदलाव की जानकारी दी है। उनके मुताबिक, सेबी की कोशिश निवेशकों का रिटर्न बढ़ाना है। आमतौर पर डायरेक्ट प्लान में रेगुलर प्लान की अपेक्षा रख-रखाव खर्च कम होता है और निवेशकों अधिक रिटर्न मिलता है। हालांकि, निवेशकों के पास रेगुलर प्लान चुनने का भी विकल्प रहेगा।
समझें डायरेक्ट प्लान का मतलब : मौजूदा व्यवस्था में एक ही म्यूचुअल फंड योजना में निवेश के दो विकल्प मिलते हैं। पहला, किसी योजना में खुद से सीधे निवेश करना। इसे डायरेक्ट प्लान कहा जाता है। इसमें कोई एजेंट या वितरक शामिल नहीं होता। निवेशक सीधे फंड कंपनी में निवेश करता है। इसके चलते कमीशन नहीं देना होता। साथ ही रख-रखाव शुल्क (एक्सपेंस रेशियो) भी कम होता है। इसमें निवेशक को खुद अपने पोर्टफोलियो में संतुलन बनाना पड़ता है।दूसरे विकल्प में निवेशक किसी वितरक या एजेंट के जरिए योजना में निवेश करता है। इसे रेगुलर प्लान कहा जाता है। इसमें वितरक या एजेंट का कमीशन शामिल होता है। इस वजह से रेगुलर प्लान का रखरखाव खर्च आमतौर पर ज्यादा होता है।
सालाना खर्च का रिटर्न पर ऐसे असर: रख-रखाव खर्च यानी एक्सपेंस रेशियो किसी म्यूचुअल फंड योजना को प्रबंधित करने और चलाने की सालाना लागत होती है। इसे योजना की कुल संपत्ति के प्रतिशत के रूप में दिखाया जाता है। इसे निवेशत योजना की यूनिट (एनएवी) से ही काटा जाता है, जिसका असर निवेशकों को मिलने वाले रिटर्न पर पड़ता है। डायरेक्ट प्लान में यह खर्च कम होता है, इससे निवेशकों को लंबी अवधि में अधिक रिटर्न मिलने की संभावना रहती है।
पोर्टफोलियो खर्च की पूरी जानकारी मिलेगी
नई व्यवस्था में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि निवेशक डायरेक्ट के बजाए रेगुलर प्लान चुनना चाहता है तो उसे बताया जाएगा कि उसमें रख-रखाव खर्च ज्यादा है। सेबी का मकसद निवेशकों को दोनों प्लान के खर्च के बारे में सही जानकारी देना है, ताकि वे सोच-समझकर फैसला कर सकें। निवेशक अपनी जरूरत के हिसाब से दोनों में से किसी भी प्लान को चुन सकेंगे
रिटर्न में कितना अंतर?
विशेषज्ञों के अनुसार, औसतन किसी इक्विटी म्यूचुअल फंड के डायरेक्ट प्लान का सालाना रखरखाव खर्च करीब 1.12 फीसदी होता है, जबकि रेगुलर प्लान में यह 2.50 फीसदी तक हो सकता है। अगर 10 साल तक हर महीने 10,000 रुपये की एसआईपी की जाए और डायरेक्ट प्लान में 15.93% सालाना रिटर्न मिले, तो करीब 29.13 लाख रुपये की रकम बन सकती है। वहीं 2.5% खर्च के आधार पर रेगुलर प्लान का अनुमानित रिटर्न 14.55% रह जाता है और रकम करीब 26.78 लाख रुपये होगी। यानी समान निवेश पर डायरेक्ट प्लान में करीब 2.35 लाख रुपये ज्यादा रकम बन सकती है।
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