ये है ‘टीचरों का गांव’, बिहार का गंजपर टोला.. यहां हर दूसरे घर में सरकारी गुरुजी

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 ये है ‘टीचरों का गांव’, बिहार का गंजपर टोला.. यहां हर दूसरे घर में सरकारी गुरुजी

नालंदा: बिहार के राजगीर में है एक ऐसा इलाका… जिसकी पहचान अब ‘गुरुग्राम’ यानी ‘गुरुओं का गांव’ के तौर पर होती है. हम बात कर रहे हैं वार्ड संख्या 24 स्थित गंजपर टोला की. गंजपर में 100 घरों में 50 से ज्यादा तो उपाध्याय टोला में 70 से अधिक शिक्षक होंगे.

ये है ‘टीचरों का गांव: साल 2005 में इस गांव की तकदीर तब बदली, जब नीतीश सरकार ने ट्रेंड शिक्षकों की बहाली ‘सर्टिफिकेट दिखाओ, नौकरी पाओ’ शुरू की. तब गांव के युवाओं का भाग्य बदल गया. नागपुर से ट्रेनिंग करके लौटे इस गांव के युवाओं की एकमुश्त नौकरी लग गई. देखा-देखी कई युवाओं ने ट्रेनिंग की और अगली बहाली में उनकी भी नौकरी लग गई. धीरे-धीरे गांव में शिक्षकों की संख्या बढ़ती गयी. आज दोनों टोला मिलाकर करीब 120-30 शिक्षक होंगे.

चाय दुकान से ‘टीचरों का गांव’ बनने की कहानी: इस एकमुश्त नौकरी ने पूरे गांव के भीतर शिक्षा की एक बड़ी क्रांति लाई. लेकिन इस ऐतिहासिक 2005 की नौकरी क्रांति के पीछे एक चाय की दुकान का बेहद दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है.

शिक्षक आर्यदेव प्रसाद बताते हैं कि इस गांव में शिक्षा की क्रांति का सबसे बड़ा श्रेय स्वर्गीय किशोरी प्रसाद यादव को जाता है. 90 के दशक में गांव की तकदीर तब बदली, जब किशोरी मास्टर की मुलाकात शारदा होटल के पास चाय की दुकान पर नागपुर के एक कॉलेज के प्रिंसिपल विवेक सर से हुई थी.

नागपुर की ट्रेनिंग: विवेक सर राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के जिस कॉलेज में प्रिंसिपल थे, उसमें शारीरिक शिक्षकों को ट्रेनिंग दी जाती थी. विवेक सर और किशोरी प्रसाद के बीच इसको लेकर बातचीत हुई और फैसला हुआ कि गांव के युवाओं को इसकी ट्रेनिंग दिलाई जाए.

चाय की दुकान पर हुई उस मुलाकात के बाद किशोरी मास्टर ने गांव के युवाओं को एक नया मार्गदर्शन दिया. उन्होंने युवाओं को शारीरिक शिक्षा (B.P.Ed) की ट्रेनिंग के लिए नागपुर भेजना शुरू किया. शारीरिक शिक्षक रणवीर कुमार रत्नाकर बताते हैं कि युवाओं का नागपुर जाना सबसे सही फैसला साबित हुआ.

रणवीर रत्नाकर बताते हैं कि इस एकमुश्त बहाली ने गांव को एक अलग पहचान दे दी. सरकारी नौकरी की देखा-देखी से कई युवाओं ने नागपुर जाकर शारीरिक शिक्षक की ट्रेनिंग ली. कई युवकों ने यहीं रहकर शिक्षक की ट्रेनिंग की. आज भी रणवीर रत्नाकर जैसे कई युवा मध्य विद्यालय देवधा सहित कई स्कूलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

एक साथ इतनी बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियां लगने के बाद तो जैसे पूरे गांव में एक होड़ सी मच गई. हर परिवार और युवा के भीतर शिक्षक बनने की एक जबरदस्त ललक पैदा हो गई. 1950 के दशक से यहां शिक्षा की जो अलख जगी थी, वो इस ललक के बाद आज तक अनवरत जारी है.

वकालत छोड़कर बन गए शिक्षक: इस गांव से निकले कई शिक्षकों की सफलता की कहानियां बेहद प्रेरणादायक हैं. इन्हीं में से एक युवा हैं चितरंजन, जो महात्मा फुले दंपत्ति की किताबों और विचारों से गहराई से प्रेरित हुए. उन्होंने B.Ed और LLB की पढ़ाई की. 5 साल तक पटना सिविल कोर्ट में वकालत भी की. लेकिन शिक्षक बनने का प्रयास जारी रखा. 2001 में रेलवे बहाली के जरिए शिक्षक बने, वर्तमान में वे कोलकाता CLW में कार्यरत हैं.

उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय कूल सिलाव की प्रधानाध्यापिका डॉ. माधवी कुमारी को शिक्षक की नौकरी विरासत में मिली है. डॉ. माधवी बताती हैं कि उन्हें शिक्षिका बनने की प्रेरणा अपने पिता डॉ. राम लखन प्रसाद से मिली, जो मगध विश्वविद्यालय में गणित और विज्ञान संकाय के HOD थे. पिता से प्रेरणा मिली और शिक्षिका बन गईं.

डॉ. माधवी नई पीढ़ी के शिक्षकों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ ‘एक्टिविटी बेस्ड’ शिक्षा देने की सलाह देती हैं. इसी मोहल्ला के रहने वाले नंद किशोर प्रसाद भी शिक्षा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं. वे न्यू एजुकेशन पॉलिसी के आधुनिक तौर-तरीकों से जुड़े हुए हैं. टीजीटी पीजीटी के बच्चों को पढ़ा रहे हैं और पूरी लगन से उनका भविष्य संवार रहे हैं.

बहाली नीति से नाराजगी भी: शिक्षक बहाली की बदलती प्रक्रियाओं पर नवनियुक्त माध्यमिक शिक्षक संघ बिहार के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. गणेश शंकर पांडे कहते हैं कि पहले और अब की प्रक्रिया में आसमान-ज़मीन का अंतर है. पहले बीएड या ट्रेनिंग के आधार पर आसानी से बहाली होती थी. शिक्षकों को पेंशन व स्केल जैसी तमाम सुविधाएं मिलती थीं. आज की सरकार ने प्रक्रिया को कठिन बना दिया है.

इसी व्यवस्था की उदासीनता का एक चेहरा विशेश्वर यादव भी हैं. 100% यादव बाहुल्य इस गांव के निवासी विशेश्वर यादव ने पीटीजेएम कॉलेज राजगीर में 1987-88 से 2023 तक ‘पाली भाषा’ के प्रोफेसर के रूप में बिना किसी वेतन के वित्त-रहित सेवा दी. कहते हैं कि जब तक नीतीश कुमार रहे, तब तक उन्हें अनुदान मिलता रहा, लेकिन लंबे समय से अब अनुदान नहीं मिल रहा है.

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