ईरान से आया था ‘संबूसग’, भारत में बन गया ‘समोसा’
समोसे का सफर: विश्व समोसा दिवस के अवसर पर जानिए रोचक इतिहास
गली-गली में गरमागरम समोसे मिलना भारत की आम बात मानी जाती है। यह स्वादिष्ट व्यंजन अब देश के लोगों के स्वाद और संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। विश्व समोसा दिवस पर विशेष रिपोर्ट में सामने आया है कि समोसा भारतीय व्यंजन नहीं, बल्कि इसका इतिहास ईरान से जुड़ा है।
इतिहास: कब और कैसे आया समोसा भारत?
समोसे का मूल नाम ‘संबूसग’ है, जिसे ईरान से व्यापारियों ने भारत लाकर यहाँ की गलियों और पकवानों में नया रूप दिया। रिपोर्ट के मुताबिक
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10वीं-13वीं सदी के बीच यह पकवान ईरान से दिल्ली तक लगभग 2500 किलोमीटर का सफर तय कर आया।
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प्रारंभ में इसमें मांस यानी मीट भरा जाता था, लेकिन भारत पहुंचते-पहुंचते इसमें आलू, मटर और मसालों का मिश्रण भरने की परंपरा शुरू हुई।
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आज समोसा भारतीय स्ट्रीट फूड में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले व्यंजनों में है।
कई देशों में हैं अलग-अलग नाम
समोसे को दुनिया के विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है:
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बोरीक, संबोसा, संबूसक, संबूसा, समुसा, समूसा, सम्बुसा आदि नामों से यह व्यंजन पहचाना जाता है।
पोषण संबंधी तथ्य
रिपोर्ट के अनुसार, समोसे में मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट, आलू, मैदा, घी, तेल और मसाले होते हैं।
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प्रति 100 ग्राम समोसे में लगभग 262 कैलोरी होती है।
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वज़न की मात्रा के अनुसार, इसमें 100-110 कैलोरी वसा, 300 कैलोरी कार्बोहाइड्रेट, और केवल 2-3 ग्राम प्रोटीन शामिल होता है।
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इसमें फेट और शुगर भी पर्याप्त मात्रा में होते हैं।
सेहत पर असर
रिपोर्ट में समोसा खाने को लेकर कहा गया है कि इसमें तेल, वसा और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा होने से ज्यादा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
प्रसिद्धि और खपत
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वर्ल्ड फूड इंडेक्स के मुताबिक, भारत में रोज़ाना औसतन छह करोड़ समोसे खाए जाते हैं।
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पूरी दुनिया के लगभग 25 देशों में समोसे का अलग-अलग रूप, नाम और आकार में आनंद लिया जाता है।
समोसा आज भले ही भारत के हर गली-मुहल्ले, शादी-विवाह और उत्सव का हिस्सा बन चुका हो, लेकिन इसकी जड़ें पारसी व फारसी संस्कृति से जुड़ी हैं। समय के साथ समोसे ने भारतीय स्वाद में अपने रंग और पहचान को इस तरह घोला है कि अब बिना समोसे के चाय या महफिल अधूरी सी लगती है।
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