गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दिन्ही दान।।
यानी… पूरी दुनिया में गिरु के समान कोई दानी नहीं है और शिष्य के समान कोई याचक नहीं है। संत कबीर का ये दोहा गुरु और शिष्य के अनमोल, अमृत समान रिश्ते की महिमा का बखान करने के लिए काफी है।
आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय, सम्माननीय शिक्षकगण, और मेरे प्रिय साथियों,
आज हम यहां उस बेहद खास उपलक्ष्य के लिए एकत्रित हुए हैं, जिसे हम शिक्षक दिवस के रूप में जानते हैं। दुनिया में वर्ल्ड टीचर्स डे 5 अक्टूबर को मनाया जाता है, लेकिन भारत में नेशनल टीचर्स डे 5 सितंबर को। क्योंकि हम ये दिन देश के महान शिक्षाविद् और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर उनकी याद में मनाते हैं। उन्होंने कहा था कि ‘अगर मेरा जन्मदिन मनाने की बजाय इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए, तो यह मेरे लिए बड़े गर्व की बात होगी।’
शिक्षक हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं। शिक्षक वह दीपक हैं जो अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। वे हमें न केवल किताबों का ज्ञान देते हैं, बल्कि जीवन की मूलभूत सीख भी सिखाते हैं। वे हमें आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और नैतिक रूप से सशक्त बनाते हैं।
ये दिन हमें यह याद दिलाता है कि हमारे जीवन में शिक्षकों का योगदान कितना महत्वपूर्ण है। हमारे शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करना कितना महत्वपूर्ण है। उनकी मेहनत और समर्पण के बिना हम सफलता की ओर नहीं बढ़ सकते। मैं अपने सभी शिक्षकों का दिल से आभार व्यक्त करना चाहता/ चाहती हूं। आपकी शिक्षा और मार्गदर्शन के लिए हम सदैव आपके ऋणी रहेंगे।
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