शेयर मार्केट- म्यूचुअल फंड में पैसा निवेश करें या घर खरीदें? जानिए किससे हो सकती है ज्यादा कमाई/फायदा – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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जब कोई 25–30 साल का नौकरीपेशा युवा अपनी बचत और होम लोन की मदद से 1 करोड़ रुपये तक का घर खरीदने की स्थिति में पहुंचता है, तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या इतनी बड़ी रकम फ्लैट में लगाना समझदारी है, या फिर किराये पर रहकर उसी पैसे को शेयर/म्यूचुअल फंड में लगाना बेहतर रहेगा।

सपना अपना घर या पहले वेल्थ?

ज्यादातर लोग अपना घर बनाने का सपना देखते हैं, लेकिन बड़े शहरों में प्रॉपर्टी की तेज़ी से बढ़ती कीमतें इसे महंगा सौदा बना देती हैं, जहां साधारण 2–3 BHK की कीमत भी लगभग 1 करोड़ तक पहुंच जाती है। ऐसे में खरीदने से पहले यह साफ करना ज़रूरी है कि घर सिर्फ निवेश के लिए ले रहे हैं या खुद रहने के लिए, क्योंकि मकसद बदलते ही फैसले की दिशा भी बदल जाती है।

अगर मकसद परिवार को स्थिरता और लंबे समय का सुरक्षा-कवच देना है, तो भले ही शेयर बाज़ार से संभावित रिटर्न ज्यादा हों, फिर भी खुद रहने के लिए घर खरीदना कई लोगों के लिए जायज फैसला माना जा सकता है। लेकिन इसके साथ अपने डेट-टू-इनकम रेश्यो (आय का कितना हिस्सा EMI में जा रहा है) और बाकी जरूरी वित्तीय लक्ष्यों का आकलन करना बहुत ज़रूरी है, ताकि घर के कारण पूरा कैशफ्लो न चोक हो जाए।

रिटर्न: इक्विटी बनाम प्रॉपर्टी

लंबी अवधि में ऐतिहासिक डेटा दिखाता है कि रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की तुलना में इक्विटी (शेयर और इक्विटी लिंक्ड म्यूचुअल फंड) ने आम तौर पर ज्यादा रिटर्न दिए हैं। जिन निवेशकों ने लगभग 15 साल तक इक्विटी या इक्विटी-लिंक्ड म्यूचुअल फंड में SIP की, उन्हें सालाना करीब 12–15% तक का रिटर्न मिला है, हालांकि भविष्य का रिटर्न पुराने आंकड़ों से तय नहीं होता।

इसके उलट बड़े महानगरों में घरों की कीमतें आम तौर पर सालाना करीब 5–8% की दर से बढ़ी हैं और इसमें से मेंटेनेंस कॉस्ट, सोसायटी चार्ज और प्रॉपर्टी टैक्स जैसी लागतें घटाने पर रियल रिटर्न और कम हो जाता है। इस लिहाज से, केवल निवेश के नजरिये से देखें तो लंबे समय में इक्विटी अक्सर प्रॉपर्टी से भारी पड़ती दिखती है।

1 करोड़ का घर: असली लागत कितनी?

मान लीजिए 1 करोड़ रुपये का घर 20 लाख की डाउन पेमेंट और 80 लाख के होम लोन से खरीदा जाता है। 80 लाख रुपये का होम लोन अगर 20 साल के लिए 9% सालाना ब्याज पर लिया जाए, तो कुल चुकाई गई रकम करीब 1.73 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है, यानी सिर्फ लोन पर ही 93 लाख के आसपास ब्याज चुका देना पड़ता है।

इस तरह घर की कुल लागत लगभग 1.93 करोड़ रुपये हो जाती है, यानी नाममात्र 1 करोड़ वाले घर की वास्तविक कीमत 20 साल में लगभग दोगुनी से भी ज्यादा बैठती है। वहीं, अगर यही 20 लाख की डाउन पेमेंट और हर महीने लगभग 72,000 रुपये EMI देने की बजाय 12% सालाना रिटर्न वाले इक्विटी फंड में नियमित निवेश किए जाएं, तो 20 साल में 10 करोड़ रुपये से अधिक का कॉर्पस बनने की संभावना दिखाई जाती है (इस तुलना में संभावित किराये की आय को शामिल नहीं किया गया)।

EMI बनाम SIP: अनुशासन कहां ज्यादा कारगर?

एक उदाहरण के तौर पर, यदि 20 साल तक हर महीने 72,000 रुपये किसी ऐसे निवेश में डाले जाएं जो औसतन 10% सालाना रिटर्न दे, तो लगभग 7.2 करोड़ रुपये तक का फंड तैयार हो सकता है। अगर यही अनुमानित रिटर्न 14% सालाना मानें, तो करीब 11.5 करोड़ रुपये तक की रकम बन सकती है, बशर्ते निवेश अनुशासित तरीके से बिना रुके चलता रहे।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि लंबी अवधि तक लगातार SIP जैसी आदत बनाए रखने पर शेयरों और इक्विटी लिंक्ड म्यूचुअल फंडों से काफी बड़ा वेल्थ क्रिएट किया जा सकता है। दूसरी ओर EMI में यह अनुशासन तो होता है, लेकिन वह आपके कैशफ्लो को बांध भी देता है और लचीलापन कम कर देता है।

किराये की आय और लिक्विडिटी

मुंबई, गुरुग्राम, बेंगलुरु जैसे शहरों में रेंटल यील्ड आम तौर पर सालाना 2–3% के आसपास रहती है, जबकि होम लोन की ब्याज दरें प्रायः 8–9% के बीच होती हैं। मतलब यह कि किराया अक्सर EMI की लागत को जस्टिफाई नहीं कर पाता और शुद्ध निवेश के नजरिये से प्रॉपर्टी कम आकर्षक दिखती है।

साथ ही, प्रॉपर्टी बेचकर पैसा निकालने में कई महीने लग सकते हैं और ब्रोकरेज व अन्य खर्च भी देने पड़ते हैं, इसलिए अचानक नौकरी जाने, बिजनेस में दिक्कत या दूसरे शहर में ट्रांसफर जैसी स्थिति में यह निवेश बोझ बन सकता है। इसके मुकाबले इक्विटी या म्यूचुअल फंड से पैसा निकालना आम तौर पर ज्यादा आसान और तेज़ है, हालांकि मार्केट रिस्क वहां भी मौजूद रहता है।

पोर्टफोलियो में प्रॉपर्टी का कितना हिस्सा?

विशेषज्ञों की राय में कुल नेटवर्थ में रियल एस्टेट यानी प्रॉपर्टी की हिस्सेदारी आम तौर पर 30–40% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। बाकी पैसा इक्विटी और फिक्स्ड इनकम जैसे फाइनेंशियल एसेट्स में रखना बेहतर माना जाता है, क्योंकि इतिहास में इन्हीं ने अपेक्षाकृत ऊंचे और अधिक पारदर्शी रिटर्न दिए हैं। 

इसका एक व्यावहारिक मतलब यह है कि एक से ज्यादा घर केवल निवेश के लिए रखना हर किसी के लिए ज़रूरी नहीं; पहले बेसिक घर और इमरजेंसी फंड के बाद ही अतिरिक्त प्रॉपर्टी पर विचार करना चाहिए। संतुलित पोर्टफोलियो में लिक्विड और ग्रोथ-ओरिएंटेड एसेट्स दोनों का सही मिश्रण होना जरूरी है, ताकि रिटर्न और सुरक्षा के बीच बैलेंस बना रहे। 

आप अभी किस विकल्प की ओर ज्यादा झुकाव महसूस कर रहे हैं – खुद रहने के लिए घर, या पहले 10–15 साल तक जोरदार इक्विटी निवेश करके बाद में घर खरीदने की रणनीति?

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