शिक्षा व्यवस्था को चाहिए नैतिक आधार

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शिक्षा व्यवस्था को चाहिए नैतिक आधार

आजादी के पहले के तीन दशक तक किसी परीक्षार्थी का पेपर लीक या साल्वर जैसे शब्दों से कोई परिचय नहीं था, लेकिन आज पेपर लीक को झेलना युवाओं की नियति बन गया है। ऐसी स्थितियों को निर्मित करनेवाले अपराधी पढ़े-लिखे ही होते हैं। वे व्यवस्था को जानते हैं और उसे चलाने वालों को चिन्हित कर उन्हें भी अपने में शामिल कर लेते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा संस्थाएं और व्यवस्था उस सर्वकालिक मूल्यबोध से कितनी दूर नहीं हो गई हैं, जिसमें उनका उद्देश्य ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ निर्माण होता है। यदि इसे बदलना है तो शिक्षा व्यवस्था के बाहर के परिदृश्य पर भी निगाह डालनी होगी और उसका विश्लेषण करना होगा।

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात कहा गया कि भविष्य के साम्राज्य ज्ञान के साम्राज्य होंगे। हालांकि भारत इसे बहुत पहले समझ चुका था कि ज्ञान से पवित्र और कुछ भी नहीं है। प्राचीन भारत के मनीषी इसे समझते थे। उनकी ज्ञान साधना का लक्ष्य सत्य की खोज और ‘सर्वभूत हिते रतः’ के दर्शन को व्यावहारिकता प्रदान करना था। इसके लिए विद्या-अध्ययन के श्रेष्ठ संस्थान स्थापित किए गए, गुणवत्ता एवं प्रतिभा को उचित अवसर देकर और उसका समुचित संवरण कर भारत ने अपनी ज्ञान-श्रेष्ठता को वैश्विक स्वीकार्यता दिलाई। आज आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञान अर्जन की जो तेजी आई है, उसमें और प्राचीन भारतीय ज्ञान अर्जन परंपरा में बहुत बड़ा अंतर है। आज मशीन-तत्व, प्रतिस्पर्धा तथा सामरिक उपयोगिता प्राथमिकता पा रहे हैं। वैसे यह स्थापित हो चुका है कि ज्ञान के साथ बुद्धि, विवेक और मानवीय संवेदना का पूर्ण-रूपेन समन्वय परम आवश्यक है।

यह भारत का नैतिक उत्तरदायित्व है कि वह सहिष्णुता के अपने विचार को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करे, लेकिन भारत इसका निर्वाह तभी कर सकेगा जब उसकी शिक्षा व्यवस्था और उसका प्रबंधन अनुकरणीय स्तर पर आ सके। चिंता की बात है कि आज ऐसा नहीं दिखाई देता है। विश्व के जिन देशों के लिए भारत केवल एक बाजार है, वे भारत को रास्ता नहीं दिखा सकते।

भारत भी पश्चिमी देशों की नकल करके यदि अपनी शिक्षा की विषयवस्तु तैयार करता है तो वह केवल डिग्री ही दे सकता है, भारतीयता नहीं। कृत्रिम मेधा यानी एआइ शिक्षा और उसके प्रबंधन को नए-नए स्तरों पर ले जा रही है। भारत को भी उसमें अग्रणी होना होगा। मगर भारतीय तत्व उसमें खो न जाए, इसका ध्यान भी रखना होगा। विश्व में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा उसी देश को प्राप्त हो सकेगी, जिसकी शिक्षा व्यवस्था गुणवत्ता, उत्कृष्टता और मानवीय तत्व से परिपूर्ण होगी। भारत की वर्तमान शिक्षा नीति में ऐसे तत्व उपलब्ध हैं, जो उसे भविष्योमुखी बना सकते हैं, लेकिन इसके लिए हर स्तर पर अकादमिक नेतृत्व की उपस्थिति आवश्यक है। पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक तक देश की शिक्षा संस्थाओं का नेतृत्व नौकरशाहों के हाथ में नहीं था। विडंबना यह है कि आज राज्यों में टेक्स्टबुक कारपोरेशन का अध्यक्ष तक एक नौकरशाह होता है।

दुखद है कि देश की शिक्षा व्यवस्था अशक्त होती जा रही है। एक राज्य के पांच सरकारी विश्वविद्यालयों में एक भी नियमित अध्यापक नहीं है। देश में एक लाख से अधिक सरकारी स्कूल केवल एक अध्यापक द्वारा चलाए जा रहे हैं। पिछले दो वर्षों में सरकारी स्कूलों में नामांकन 86 लाख घटा है, जबकि निजी स्कूलों में इसी दौरान 88 लाख बढ़ा है। संविधान देश के बच्चों को समानता और समता के आधार पर शिक्षा का अधिकार देता है, लेकिन क्या इसमें अध्यापकों की नियमित नियुक्ति सम्मिलित नहीं है? चाहे स्कूल हों या विश्वविद्यालय, मूलभूत आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिए। केवल नीति में शिक्षक-छात्र अनुपात के महत्व को दर्शाना और व्यावहारिकता में उससे आंख चुरा लेना हर उस बच्चे के साथ अन्याय है, जो सरकारी व्यवस्था में पढ़ने को मजबूर है। यह बच्चा उस व्यक्ति के परिवार से आता है जिसे शिक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है, जो गांधी जी द्वारा इंगित पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़ा है।

प्रश्न पत्रों का लगातार लीक होना और उसके बाद जंतर-मंतर जैसी घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि जो युवा शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं वे अपने भविष्य को लेकर कितने सशंकित हैं? आंकड़े कहते हैं कि एक वर्ष में केवल सात प्रतिशत स्नातकों को ही नियमित वेतनमान वाला रोजगार मिल पाता है। देश के 67 प्रतिशत स्नातक युवा रोजगार नहीं पा सकें हैं। आउटसोर्सिंग की प्रथा ने बिचौलियों को रोजगार के क्षेत्र में लाकर युवाओं के शोषण का नया क्षेत्र खोल दिया है। भविष्य की अनिश्चितता तनाव को बढ़ाती है। इसका नकारात्मक प्रभाव विद्यार्थियों की संकल्पना शक्ति और वैचारिक प्रतिभा पर पड़ता है। इससे जिज्ञासाएं कुंठित हो जाती हैं और सृजनात्मकता भी सीमित हो जाती है। ऐसे में नवाचारों का दायरा भी सिकुड़ जाता है।

देश की बौद्धिक संपदा में उस दिन कई गुना वृद्धि हो जाएगी जब हर बच्चे को अपेक्षित स्तर का स्कूल, उचित संख्या में प्रशिक्षित और संतुष्ट अध्यापक तथा आवश्यक संसाधनों से सज्जित स्कूल मिल सकेगा और किसी युवा को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति के कारण उच्च शिक्षा में जाने में कोई असुविधा नहीं होगी।

(लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)

response@jagran.com

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