वाशिंगटन, एजेंसी। दुनिया की 7000 भाषाओं में से हर साल कुछ भाषाएं विलुप्त होती जा रहीं हैं। एक दशक पहले हर तीन माह पर एक भाषा लुप्त हो रही थी। वहीं 2019 में 40 दिन के दौरान एक भाषा विलुप्त होने लगी। दूसरे शब्दों में कहें तो एक साल में नौ भाषाएं विलुप्त हो रही हैं।
भाषाएं लुप्त होने का प्रमुख कारण है कि माता-पिता अपने बच्चों से मातृभाषा में बात करना बंद कर रहे हैं। वहीं, कई समुदाय अपने आलेखों को पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। नुकसान की दर लगातार तेज हो रही है। संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृति एजेंसी, यूनेस्को ने अनुमान लगाया कि दुनिया की आधी भाषाएं सदी के अंत तक खत्म हो जाएंगी। कुछ भाषाएं उनके अंतिम वक्ताओं के साथ गायब ही हो रहीं हैं। हजारों भाषाएं विलुप्ति की कगार पर हैं क्योंकि उन्हें बोलने वाले कम हो गए हैं। ऐसी भाषाएं न तो स्कूलों में बोली जा रही हैं और न ही काम करने की जगह पर। अधिकांश समुदायों में भाषाओं को बचाने की मुहिम जारी है। इन्हें लगता है कि दुनिया में जिन भाषाओं का वर्चस्व है कहीं उससे उनकी परंपरा न खो जाए। इनका मानना है कि अंग्रेजी और हिंदी जैसी भाषाओं के कारण क्षेत्रीय बोली खत्म हो सकती है।
नाइजीरिया के तोची प्रीसियस भी अपनी पारंपरिक भाषा इगोबो को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि भाषा से समुदाय की परंपरा और संस्कृति जुड़ी होती है। इसलिए इसका बचाव जरूरी है। अपनी भाषा को बचाने के लिए उन्होंने ऑनलाइन टूल- विकिटंग का सहारा लिया है।
रिकॉर्डिंग के जरिए कोशिश :
भारत में बिहार के पूर्व में अंगिका भाषा बोलने वाले अमृत सूफी ने अपनी बोली को बचाने के लिए वीडियो रिकॉर्ड कर लिया है। साथ ही ट्रांसक्रिप्शन और अनुवाद भी उपलब्ध करा रहे हैं।
भारत की इन भाषाओं पर जोखिम अधिक
■ कर्नाटक की कोरगा को बोलने वाले 16,000 लोग बचे हैं
■ हिमाचल प्रदेश की सिरमौरी बोलने वाले केवल 31,000 लोग हैं।
■ छत्तीसगढ़ की पारजी भाषा 50,000 लोग बोल रहे हैं।
■ दक्षिण भारत का टोडा भी खतरे में
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