जाति-प्रमाण पत्र रद्द किए बिना सेवा से हटाना अवैध – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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प्रयागराज। कैट की इलाहाबाद पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि जब तक किसी कर्मचारी का जाति प्रमाण पत्र सक्षम प्राधिकारी द्वारा रद्द नहीं किया जाता, तब तक उसकी नियुक्ति को केवल संदेह के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता। यह आदेश Xन्यायमूर्ति ओम प्रकाश सप्तम एवं मोहन प्यारे की पीठ ने डाक विभाग के कर्मचारी संदीप कुमार गोंड की याचिका पर उसके अधिवक्ता मयंक कृष्ण सिंह चंदेल व दूसरे पक्ष के वकील को सुनकर दिया है। इसी के साथ कैट ने डाक विभाग में कार्यरत संदीप कुमार गोंड की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए उसे सभी सेवा लाभ के साथ बहाल करने का निर्देश दिया है।

संदीप कुमार गोंड को वर्ष 1999 में आजमगढ़ जिले के पथखौली में अतिरिक्त विभागीय डाक चपरासी के पद पर अनुसूचित जाति कोटे के तहत नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति को गणेश राम ने चुनौती दी थी। उसका आरोप लगाया था कि संदीप वास्तव में गोंड जाति के नहीं बल्कि कहार जाति का है, जो अन्य पिछड़ा वर्ग में आती है। इसी शिकायत व तहसील की एक जांच रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने वर्ष 2012 में दिलीप की सेवा समाप्त कर दी थी।

Xकैट ने स्पष्ट किया कि जब तक 1996 में जारी मूल जाति प्रमाण पत्र को फर्जी साबित कर रद्द नहीं किया जाता, तब तक सेवा समाप्त करना पूरी तरह अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर है। कैट ने कहा कि नियुक्ति के समय जो अधिसूचनाएं प्रभावी थीं, उनके आधार पर हुए चयन को बाद के किसी नियम या स्थिति परिवर्तन से नहीं बदला जा सकता। विभाग ने बिना ठोस सबूत और बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए नई जांच के आधार पर संदीप को हटाने का निर्णय लिया, जो कानूनन गलत है।

Xन्यायाधिकरण ने याची की बर्खास्तगी के आदेशों खारिज करते हुए उसे तीन महीने के भीतर सेवा में वापस लेने और सभी पिछला बकाया देने का निर्देश दिया। यह भी कहा कि तीन महीने में भुगतान नहीं होता है, तो बकाया राशि पर छह प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देना होगा। कैट ने Xकहा कि विभाग चाहे तो जिला प्रशासन के माध्यम से जाति प्रमाण पत्र की नए सिरे से विधिवत जांच करा सकता है, जिसमें दोनों पक्षों को सुनवाई का मौका दिया जाए।

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