समायोजन प्रक्रिया में शिक्षकों के साथ हो रही विसंगतियाँ : एक गंभीर चिंता – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में वर्तमान में छात्र-शिक्षक अनुपात के आधार पर शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं को “सरप्लस” घोषित कर समायोजन की प्रक्रिया चल रही है। परंतु यह प्रक्रिया पूरे प्रदेश में एक समान और पारदर्शी न होकर विभिन्न जिलों में अलग-अलग नियमों के आधार पर संचालित हो रही है, जिससे शिक्षकों में असंतोष और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।

प्रमुख विसंगतियाँ एवं समस्याएँ

1. सरप्लस निर्धारण में एकरूपता का अभाव

 कुछ जिलों में कनिष्ठ शिक्षक को सरप्लस किया जा रहा है, जबकि कहीं वरिष्ठ शिक्षक को।

 इससे समान परिस्थितियों में कार्यरत शिक्षकों के साथ अलग-अलग व्यवहार हो रहा है।

2. वरिष्ठता निर्धारण का अलग-अलग आधार

कहीं वरिष्ठता का निर्धारण जनपद में कार्यभार ग्रहण तिथि से किया जा रहा है।

 कहीं विद्यालय में कार्यभार ग्रहण तिथि को आधार बनाया जा रहा है।

 यह असंगति न्यायसंगत एवं पारदर्शी प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।

3. महिला शिक्षकों को लेकर भिन्न नियम

 कुछ जिलों में महिला शिक्षकों को सरप्लस प्रक्रिया से छूट दी जा रही है।

 जबकि अन्य जिलों में ऐसा कोई प्रावधान लागू नहीं है।

इससे समानता के सिद्धांत का उल्लंघन हो रहा है।

4. कंपोजिट विद्यालयों में वरिष्ठता विवाद

कुछ वर्ष पूर्व प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों को मिलाकर कंपोजिट विद्यालय बनाए गए।

 शासनादेश के अनुसार प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक को उच्च प्राथमिक विद्यालय का सहायक अध्यापक माना जाना था।

 लेकिन कई जिलों में वरिष्ठता निर्धारण में इस आदेश की अनदेखी की गई।

 5. टेट अर्हता की अनदेखी

 ऐसे प्रधानाध्यापक जिन्हें उच्च प्राथमिक स्तर का TET उत्तीर्ण नहीं है, उन्हें उच्च प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के रूप में समायोजित कर दिया गया।

 यह नियुक्ति नियमों एवं गुणवत्ता दोनों के विपरीत है।

 6. प्रधानाध्यापक पद समाप्ति के बावजूद विसंगति

 150 से कम छात्र संख्या वाले प्राथमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापक पद समाप्त माना जा रहा है।

100 से कम छात्र संख्या वाले उच्च प्राथमिक विद्यालयों में हेडमास्टर पद समाप्त किया जा रहा है।

 फिर भी सरप्लस सूची में इन्हें सहायक अध्यापक मानकर गणना की जा रही है, जो विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न करता है।

7. उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विषयवार शिक्षकों की अनदेखी

 नियम के अनुसार उच्च प्राथमिक विद्यालय में विषयवार न्यूनतम तीन शिक्षक होने चाहिए।

 लेकिन समायोजन प्रक्रिया में इस अनिवार्यता का पालन नहीं किया जा रहा।

इससे गणित, विज्ञान, भाषा जैसे विषयों की शैक्षणिक गुणवत्ता प्रभावित होगी।

निष्कर्ष

समायोजन प्रक्रिया का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को संतुलित एवं प्रभावी बनाना होना चाहिए, न कि शिक्षकों में असमानता, भ्रम और असुरक्षा उत्पन्न करना। पूरे प्रदेश में एक समान, पारदर्शी एवं न्यायसंगत नीति लागू होना आवश्यक है। शासन को चाहिए कि:

 स्पष्ट एवं एकरूप दिशा-निर्देश जारी करे,

 वरिष्ठता निर्धारण का एक समान आधार तय करे,

विषयवार शिक्षक व्यवस्था सुनिश्चित करे,

तथा सभी आदेशों एवं नियमों का समान रूप से पालन कराए।

शिक्षकों के सम्मान, सेवा सुरक्षा एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के हित में यह अत्यंत आवश्यक है।

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