TET अनिवार्यता मामले में सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पर सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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सिविल अपील संख्या 1385/2025 में टीईटी अनिवार्यता के संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध दाखिल रिव्यू याचिकाओं पर आज महत्वपूर्ण सुनवाई सम्पन्न हुई। सुनवाई के दौरान देशभर से आए शिक्षक संगठनों और याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने मजबूती के साथ अपना पक्ष रखा। अंत में माननीय न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

सुनवाई के समय सुप्रीम कोर्ट में टी.एफ.आई. की ओर से डॉ. दिनेश चन्द्र शर्मा, श्री संजय सिंह, श्री राम मूर्ति ठाकुर, श्री राधेरमण त्रिपाठी, श्री अनूप केसरी, श्री देवेन्द्र श्रीवास्तव, श्री मेघराज भाटी, श्री अशोक कुमार शर्मा एवं सलीम सहाय तिग्गा सहित कई प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने रखा शिक्षकों का पक्ष

देश के विभिन्न राज्यों से दाखिल रिव्यू याचिकाओं की ओर से लगभग एक दर्जन प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने शिक्षकों का पक्ष प्रभावशाली ढंग से रखा। अधिवक्ताओं ने तथ्यों और विधिक प्रावधानों के आधार पर यह तर्क दिया कि आर.टी.ई. लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू नहीं की जा सकती।

सुनवाई के प्रमुख बिंदु

1. उत्तर प्रदेश सरकार का रुख

सुनवाई की शुरुआत उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष से हुई।
याचियों के अनुसार, राज्य सरकार की ओर से यह स्वीकार नहीं किया गया कि वर्ष 2017 का संशोधन आर.टी.ई. लागू होने से पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू नहीं होता। साथ ही, सरकार की ओर से ऐसा कोई विशेष तथ्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया जो पूर्व नियुक्त शिक्षकों के पक्ष को मजबूती देता हो।

2. 23 अगस्त 2010 के राजपत्र का हवाला

वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण तथ्य रखा कि आर.टी.ई. लागू होने के समय जारी 23 अगस्त 2010 के राजपत्र में पूर्व से नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी लागू नहीं किया गया था।
याचियों की ओर से यह दलील दी गई कि उसी आधार पर वर्षों तक शिक्षकों ने सेवाएं दीं और बाद में लागू संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू करना न्यायसंगत नहीं होगा।

3. न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पूछा कि—

जब संसद ने वर्ष 2017 में आर.टी.ई. अधिनियम में संशोधन कर 31 मार्च 2015 तक नियुक्त एवं कार्यरत सभी शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य कर दिया था, तब उस संशोधन को चुनौती क्यों नहीं दी गई?

इस पर याचियों की ओर से यह पक्ष भी सामने आया कि भारत के अधिकांश राज्यों ने इस संशोधन को लागू करने के लिए कोई स्पष्ट शासनादेश जारी नहीं किया था, जिसके कारण शिक्षकों के बीच भ्रम की स्थिति बनी रही।

फैसला सुरक्षित

लंबी और विस्तृत सुनवाई के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। अब देशभर के हजारों शिक्षक इस फैसले का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि यह निर्णय बड़ी संख्या में कार्यरत शिक्षकों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।

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