“यूपी के स्कूलों में डिजिटल शिक्षा पर सवाल: ICT लैब, स्मार्ट क्लास और डिजिटल लाइब्रेरी का नहीं हो रहा पूरा उपयोग” – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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ICT लैब, स्मार्ट क्लास और डिजिटल लाइब्रेरी के उपयोग में प्रदेश के कई जिले फिसड्डी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में छात्रों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ने के लिए पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर आईसीटी लैब, स्मार्ट क्लास और डिजिटल लाइब्रेरी जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। सरकार का उद्देश्य बच्चों को तकनीकी रूप से दक्ष बनाना और डिजिटल माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई इन सुविधाओं का अपेक्षित उपयोग नहीं हो पा रहा है, जिससे डिजिटल शिक्षा का लक्ष्य अधूरा नजर आ रहा है।

शिक्षा विभाग की समीक्षा में सामने आया है कि कई जिलों में डिजिटल संसाधनों का उपयोग बेहद कम है। कहीं 50 प्रतिशत से भी कम उपयोग दर्ज हुआ है तो कई विद्यालयों में डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल लगभग न के बराबर है। यही वजह है कि छात्रों को डिजिटल शिक्षा का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

हजारों विद्यालयों में स्थापित हैं आईसीटी लैब

वर्ष 2022-23 से अब तक प्रदेश के परिषदीय और कंपोजिट विद्यालयों में लगभग 6,697 आईसीटी लैब स्थापित की जा चुकी हैं। इन लैबों के माध्यम से विद्यार्थियों को कंप्यूटर आधारित शिक्षा, डिजिटल कंटेंट और आधुनिक तकनीकों से परिचित कराने का लक्ष्य रखा गया था।

हालांकि समीक्षा रिपोर्ट बताती है कि कई जिलों में इन लैबों का उपयोग संतोषजनक नहीं है। कुछ विद्यालयों में उपकरण सक्रिय नहीं हैं, जबकि कई जगह डेटा अपलोड न होने या तकनीकी समस्याओं के कारण वास्तविक उपयोग का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

डिजिटल लाइब्रेरी के उपयोग में सबसे खराब स्थिति

प्रदेश में अब तक 1,129 विद्यालयों में डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की गई हैं, लेकिन इनका उपयोग सबसे कम पाया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार कई जिलों में डिजिटल लाइब्रेरी का उपयोग लगभग शून्य है। फिरोजाबाद, हाथरस, एटा, मैनपुरी, लखीमपुर खीरी, बरेली और संभल जैसे जिलों में बड़ी संख्या में विद्यालयों में डिजिटल लाइब्रेरी मौजूद होने के बावजूद उनका नियमित उपयोग नहीं हो रहा। कई स्कूलों में पूरे सप्ताह में केवल कुछ मिनटों तक ही डिजिटल लाइब्रेरी का प्रयोग दर्ज किया गया।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल लाइब्रेरी का उद्देश्य बच्चों को ई-बुक्स, वीडियो कंटेंट और इंटरैक्टिव शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराना था, लेकिन उपयोग न होने से यह व्यवस्था अपने मकसद से भटकती दिखाई दे रही है।

स्मार्ट क्लास भी नहीं बदल पा रही तस्वीर

वर्ष 2022-23 से 2024-25 के बीच प्रदेश के 25,790 विद्यालयों में स्मार्ट क्लास की सुविधा शुरू की गई। इसके बावजूद बड़ी संख्या में विद्यालयों में या तो उपकरण सक्रिय नहीं हैं या फिर उनका उपयोग बहुत सीमित समय के लिए किया जा रहा है।

प्रयागराज, वाराणसी, देवरिया, ललितपुर, जौनपुर, बाराबंकी और मिर्जापुर सहित कई जिलों में समीक्षा के दौरान पाया गया कि स्मार्ट क्लास उपकरण या तो निष्क्रिय पड़े हैं या उनका डेटा उपलब्ध नहीं है। कई विद्यालयों में प्रतिदिन केवल 15 से 20 मिनट तक ही स्मार्ट क्लास का उपयोग किया जा रहा है, जबकि इसका उद्देश्य नियमित शिक्षण प्रक्रिया को तकनीक से जोड़ना था।

शासन ने जताई नाराजगी

डिजिटल संसाधनों के कम उपयोग पर शासन स्तर पर भी नाराजगी व्यक्त की गई है। हाल ही में हुई समीक्षा बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि विद्यालयों में उपलब्ध डिजिटल सुविधाओं का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जाए।

बेसिक शिक्षा विभाग ने प्रत्येक जिले में 50-50 डिवाइसों की ऑनलाइन टेस्टिंग शुरू कर दी है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कौन से उपकरण सक्रिय हैं, कहां तकनीकी समस्याएं हैं और किन विद्यालयों में डिजिटल संसाधनों का उपयोग नहीं हो रहा है।

जुलाई से शुरू होगा विशेष अभियान

विभागीय अधिकारियों के अनुसार जुलाई से शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र में डिजिटल शिक्षा को लेकर विशेष अभियान चलाया जाएगा। विद्यालयों को निर्देश दिए जाएंगे कि आईसीटी लैब, स्मार्ट क्लास और डिजिटल लाइब्रेरी का नियमित उपयोग सुनिश्चित करें तथा उसकी रिपोर्ट भी उपलब्ध कराएं।

इसके साथ ही शिक्षकों को डिजिटल उपकरणों के बेहतर उपयोग का प्रशिक्षण देने और तकनीकी समस्याओं के समाधान पर भी जोर दिया जाएगा।

छात्रों के भविष्य से जुड़ा है मामला

विशेषज्ञों का कहना है कि आज के दौर में डिजिटल शिक्षा केवल एक विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। यदि विद्यालयों में उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी उपयोग नहीं हुआ तो ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच डिजिटल अंतर और बढ़ सकता है।

ऐसे में जरूरी है कि सरकार, शिक्षा विभाग और विद्यालय प्रशासन मिलकर यह सुनिश्चित करें कि करोड़ों रुपये की लागत से तैयार की गई डिजिटल सुविधाएं केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका लाभ सीधे छात्रों तक पहुंचे और वे तकनीक आधारित शिक्षा में दक्ष बन सकें।

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