पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना कदाचार, विभागीय अनुमति जरूरी: हाईकोर्ट
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि पहली पत्नी के जीवित रहते विभागीय अनुमति के बिना दूसरी शादी करना सीआरपीएफ के नियमों का उल्लंघन है और इसे गंभीर कदाचार माना जाएगा। अदालत ने विभागीय कार्रवाई के तहत बर्खास्त किए गए सीआरपीएफ कांस्टेबल को राहत देने से इनकार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी।
दूसरी शादी के लिए नहीं ली विभागीय अनुमति
मामला प्रयागराज निवासी सीआरपीएफ कांस्टेबल का है। याची ने वर्ष 1976 में पहली पत्नी से शादी की थी और 1988 में सीआरपीएफ में कांस्टेबल पद पर नियुक्त हुआ। बाद में पहली पत्नी के साथ संबंध बिगड़ने के बाद उसने दूसरी शादी कर ली।
रिपोर्ट के अनुसार, दूसरी शादी करने से पहले उसने विभाग से अनुमति नहीं ली और न ही विभाग को इसकी जानकारी दी। विभागीय जांच के बाद उसे सीआरपीएफ अधिनियम के उल्लंघन का दोषी मानते हुए 8 जुलाई 2011 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को सही माना
कांस्टेबल की ओर से दलील दी गई कि दूसरी पत्नी का नाम उसने सेवा रिकॉर्ड में नामिनी के तौर पर दर्ज कराया था, जिसे विभाग को सूचना देने के रूप में माना जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने कहा कि पहली पत्नी के जीवित रहते बिना विभागीय अनुमति दूसरी शादी करना गंभीर कदाचार है। अदालत ने विभागीय कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
विभागीय कर्मचारियों के लिए अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उन सरकारी और विभागीय कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनकी सेवा नियमावली में दूसरी शादी को लेकर विशेष प्रावधान हैं। अदालत के अनुसार, केवल सेवा रिकॉर्ड में दूसरी पत्नी का नाम दर्ज करा देना विभागीय अनुमति का विकल्प नहीं माना जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि लागू सेवा नियमों का पालन किए बिना दूसरी शादी करने पर कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।
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