ऐसे विद्यालय जहां तीन वर्ष से छात्र संख्या 150/100 से कम है वहां प्रधानाध्यापक का पद शून्य हो जाता है। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने शासनादेश भी जारी कर दिया है। दिनांक 14/11/2025 के शासनादेश से सरकार ने प्रधानाध्यापक के पद को शून्य किया है।
इस तरह जिला समिति अगर प्रधानाध्यापक को सरप्लस नहीं कर रही है इसके स्थान पर किसी कनिष्ठ शिक्षक शिक्षिका को सरप्लस नहीं कर सकती है।
**कोर्ट नंबर – 18**
**केस :- WRIT – A No. – 7452 of 2024**
**याचिकाकर्ता :- आलोक गिरी एवं अन्य**
**प्रतिवादी :- उत्तर प्रदेश राज्य के माध्यम से अतिरिक्त मुख्य सचिव, बेसिक शिक्षा विभाग, लखनऊ एवं 2 अन्य**
**याचिकाकर्ता के वकील :- दुर्गा प्रसाद शुक्ल, अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी**
**प्रतिवादियों के वकील :- सी.एस.सी., रण विजय सिंह, ऋषभ त्रिपाठी**
**माननीय मनीष माथुर, जे.**
1. याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील श्री अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी के साथ श्री दुर्गा प्रसाद शुक्ल, विपक्षी संख्या 1 के विद्वान राज्य वकील, विपक्षी संख्या 2 के विद्वान वकील श्री रण विजय सिंह तथा विपक्षी संख्या 3 के विद्वान वकील श्री ऋषभ त्रिपाठी को सुन लिया गया।
2. चुनौती 16.08.2024 की परिपत्र (सर्कुलर) के उस हिस्से को दी गई है जिसमें हेडमास्टर/हेडमिस्ट्रेस के पद पर कार्यरत शिक्षकों को अनुसूची (Schedule) के संदर्भ में, जो कि बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 19 तथा 25 से संबंधित है, अधिशेष शिक्षकों (surplus teachers) के रूप में स्थानांतरित/समायोजित किए जाने की आवश्यकता का प्रावधान है।
3. याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील ने यह तर्क दिया कि पूर्व में उक्त पदों की सेवा शर्तें और नियुक्ति उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 द्वारा शासित थीं, जिसके अनुसरण में 03.01.1981 को उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (शिक्षक) सेवा नियमावली, 1981 अधिसूचित की गई थी, जिसमें धारा 2 (d-1) के अंतर्गत ‘शिक्षक’ को नर्सरी स्कूलों, बेसिक स्कूलों, जूनियर बेसिक स्कूलों या सीनियर बेसिक स्कूलों में निर्देश देने (imparting instructions) के लिए नियोजित व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया था।
4. यह कहा गया कि तत्पश्चात 18.08.2008 को उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (शिक्षक) (पोस्टिंग) नियमावली, 2008 भी प्रकाशित की गई, जिसमें धारा 2 (s) के अंतर्गत ‘शिक्षक’ शब्द को जूनियर बेसिक स्कूल या सीनियर बेसिक स्कूल में शिक्षा प्रदान करने के लिए नियुक्त व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया।
5. इसलिए यह तर्क दिया गया कि हेडमास्टर/हेडमिस्ट्रेस का पद शिक्षक की परिभाषा में समाहित हो जाएगा क्योंकि किसी विशेष स्कूल का हेडमास्टर/हेडमिस्ट्रेस भी शिक्षा प्रदान करता है।
6. यह कहा गया कि तत्पश्चात वर्ष 2009 का अधिनियम अधिसूचित किया गया जिसमें स्कूल के लिए छात्र-शिक्षक अनुपात (student-teacher ratio) दर्शाने वाली अनुसूची है। यद्यपि उक्त अनुसूची 150 से अधिक छात्र संख्या वाले स्कूल के लिए हेड टीचर के पद का प्रावधान करती है, किंतु 150 से कम बच्चों वाले स्कूलों के लिए हेड टीचर का पद निर्धारित नहीं किया गया है।
7. यह कहा गया कि उक्त चुनौतीग्रस्त परिपत्र दिनांक 16.08.2024 के पैराग्राफ 2 में यह प्रावधान है कि 0 से 150 छात्र संख्या वाले स्कूलों के हेड टीचर को अनिवार्य रूप से अधिशेष माना जाएगा और उन्हें अन्यत्र समायोजित किया जाएगा।
8. इसलिए यह तर्क दिया गया कि चूंकि हेड टीचर के पद को शिक्षक से अलग और भिन्न वर्गीकृत करने वाला कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है, अतः परिपत्र में की गई यह वर्गीकरण मनमाना और अनुचित है तथा अधिनियम या उसके अंतर्गत बनाई गई अनुसूची के उद्देश्य से संबंधित नहीं है। अतः उक्त वर्गीकरण स्पष्ट रूप से अनुचित है।
9. यह कहा गया कि उक्त परिपत्र कथित रूप से राज्य सरकार द्वारा जारी शासनादेश दिनांक 26.06.2024 के निर्देशों का अनुपालन करते हुए जारी किया गया है, किंतु न तो उक्त अधिनियमों, नियमों में और न ही उक्त शासनादेश में ऐसी कोई शर्त है जिसके तहत यह वर्गीकरण किया जाना आवश्यक हो।
10. याचिकाकर्ता के विद्वान वकील ने तत्पश्चात यह तथ्य उठाया कि Writ-A No. 10686 of 2024, गोविंद कौशिक एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य में शासनादेश दिनांक 26.06.2024 के खंड 2(3), 2(7), 2(8) और 2(9) को चुनौती दी गई थी। उक्त याचिका दिनांक 29.07.2024 को निपटाई गई, किंतु केवल राज्य द्वारा ली गई उस स्थिति तक सीमित थी कि उक्त नीति को आंशिक रूप से संशोधित कर 30.06.2024 के अनुसार छात्र-शिक्षक अनुपात पर निर्भर किया जाएगा। इसलिए यह कहा गया कि उक्त निर्णय ने वर्तमान याचिका में उठाए गए मुद्दे पर बिल्कुल विचार नहीं किया है और इसलिए यह बाध्यकारी पूर्ववृत्त (binding precedent) नहीं होगा।
11. विपक्षी पक्षों के विद्वान वकीलों ने याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील द्वारा दिए गए तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि चुनौतीग्रस्त परिपत्र अधिनियम 2009 की अनुसूची के अनुसरण में तथा उसके उद्देश्य और लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए तथा शासनादेश दिनांक 26.06.2024, विशेष रूप से उसके खंड 17 के अंतर्गत जारी किया गया है, जिसमें बोर्ड को प्रत्येक स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने तथा अधिशेष शिक्षकों के समायोजन संबंधी आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई है। यह कहा गया कि राज्य में अनेक बेसिक स्कूल ऐसे हैं जिनमें कोई हेड टीचर नहीं है और चुनौतीग्रस्त परिपत्र के प्रावधान मुख्यतः उन स्कूलों में जहां हेड टीचर का पद रिक्त है, हेड टीचर की नियुक्ति की शर्तों को पूरा करने के लिए हैं।
12. विपक्षी पक्षों के विद्वान वकील ने यह भी कहा कि चूंकि अभी तक कोई स्थानांतरण आदेश पारित नहीं किया गया है, इसलिए वर्तमान याचिका केवल आशंका (apprehension) के आधार पर दायर की गई है। चूंकि याचिकाकर्ताओं को उनके विकल्प मांगते हुए नोटिस जारी किए गए हैं, वे उसी के संबंध में प्रतिनिधान (representation) दे सकते हैं जिस पर विचार कर निर्णय लिया जाएगा।
13. प्रथम दृष्टया, याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील द्वारा दिए गए तर्कों में बल है और इन्हें विचार की आवश्यकता है। इसलिए विपक्षी पक्षों को इसके संबंध में उत्तर दाखिल करने के लिए दस दिन का समय दिया जाता है। विपक्षी पक्षों के विद्वान वकील द्वारा याचिका केवल आशंका पर आधारित होने संबंधी आपत्ति निराधार है क्योंकि समायोजन संबंधी परिपत्र को ही चुनौती दी गई है। उक्त आपत्तियों को तदनुसार खारिज किया जाता है।
14. Writ-A No. 7241 of 2024 के साथ जोड़कर सूचीबद्ध किया जाए।
15. इस न्यायालय के आगे के आदेश तक, परिपत्र दिनांक 16.08.2024 के पैराग्राफ 2 के प्रावधान, जहां तक वे 150 से कम छात्र संख्या वाले बेसिक स्कूल के हेड टीचर को समायोजन के उद्देश्य से अधिशेष माने जाने का संकेत देते हैं, स्थगित (stayed) रहेंगे और परिणामस्वरूप याचिकाकर्ताओं के वर्तमान कार्य को बाधित नहीं किया जाएगा।
**आदेश की तिथि :- 05.09.2024**
**सतीश**
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