प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी स्कूल में शिक्षिका के रूप में नियुक्ति से पहले किसी महिला की विवाहित व्यक्ति से दूसरी शादी को दुराचरण नहीं माना जा सकता है। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ रीना नामक शिक्षिका की याचिका स्वीकार करते हुए सेवा समाप्त करने वाला आदेश रद कर दिया है और प्रतिवादी अधिकारियों को यह निर्देश दिया कि वे याची को उचित नोटिस देने के बाद नया और तर्कसंगत आदेश पारित करें।
वर्ष 2015 में याची को प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक पद पर नियुक्त किया गया। इस शिकायत पर कि उसने ऐसे व्यक्ति से विवाह किया जो पहले से ही विवाहित था, उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। कहा गया कि उसकी सेवाएं समाप्त करने से पूर्व कोई जांच नहीं की गई और उसे अपने पति के पहले विवाह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। कोर्ट ने कहा, यूपी सरकारी कर्मचारी आचरण
नियमावली, 1956 का नियम 29 (2) यह प्रविधान करता है कि कोई भी महिला कर्मचारी सरकार की पूर्व अनुमति के बिना ऐसे पुरुष से विवाह नहीं करेगी, जिसकी पत्नी जीवित हो। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यूपी बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 की धारा 19, राज्य सरकार को यह अधिकार देती है कि वह बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूलों में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के पदों पर भर्ती तथा नियुक्त व्यक्तियों की सेवा शर्तों के संबंध में नियम बनाए। कोर्ट ने कहा कि आचरण नियमावली की प्रयोज्यता केवल उन लोगों तक सीमित है, जो सरकारी सेवा में आ चुके हैं। नियुक्ति से पहले के चरण में किसी व्यक्ति के खिलाफ इन नियमों का हवाला नहीं दिया जा सकता। चूंकि कथित वैवाहिक अनियमितता वर्ष 2009 से संबंधित है, यानी याची की 2015 में हुई नियुक्ति से काफी पहले की बात है, इसलिए आचरण नियमावली, 1956 के नियम 29 के प्रविधान याचिकाकर्ता के मामले पर स्पष्ट रूप से लागू नहीं होते।
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