52 की उम्र; 28 साल बच्चों को पढ़ाया, अब करनी पड़ रही है TET की तैयारी! TET अनिवार्यता पर छलका शिक्षक का दर्द – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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  सुप्रीम कोर्ट के एक बेहद अहम और दूरगामी फैसले ने साल 2010 से पहले के कार्यरत शिक्षकों के लिए भी शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को अनिवार्य कर दिया है. इस आदेश के बाद देश भर के शिक्षा विभागों में हड़कंप मच गया है। विशेषकर वे वरिष्ठ शिक्षक भारी मानसिक तनाव और असमंजस में हैं, जिन्होंने अब तक टेट परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है। शिक्षकों का तर्क है कि करियर के इस अंतिम पड़ाव पर उनके लिए दोबारा किताबें उठाना और इस उम्र में प्रतियोगी परीक्षा में बैठना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है। उनका सवाल है, “जब हम पिछले 20 सालों से पूरी निष्ठा के साथ स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं, तो करियर के इस मोड़ पर हमारी परीक्षा क्यों ली जा रही है?”

देश भर में दिखेगा असर, आंकड़े डराने वाले

इस निर्णय का व्यापक प्रभाव किसी एक राज्य पर नहीं, बल्कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने जा रहा है, जिससे करीब 25 लाख शिक्षक सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। आंकड़ों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा करीब 1.80 लाख नॉन-टीईटी शिक्षकों के करियर पर असर पड़ेगा। इसके अलावा, मध्य प्रदेश में 1.5 लाख, छत्तीसगढ़ में 85 हजार और राजस्थान में तृतीय श्रेणी (लेवल-1 और लेवल-2) के लगभग 80 हजार शिक्षक इस फैसले के दायरे में आ रहे हैं। उत्तराखंड में करीब ऐसे 24 हजार शिक्षक हैं, वहीं झारखंड के 40 हजार वरिष्ठ शिक्षकों को भी अब अपनी नौकरी बचाने के लिए इस परीक्षा को पास करना होगा।

 28 साल की सेवा के बाद TET की तैयारी कर रहें हैं सुरेश भट्ट

इस फैसले के दायरे में उत्तराखंड के करीब 24 हजार बेसिक, जूनियर और एलटी (LT) कैडर के शिक्षक आ रहे हैं। हालांकि, कोर्ट ने इस आदेश के तहत एक राहत भी दी है कि जिन शिक्षकों की रिटायरमेंट में केवल 5 साल या उससे कम की नौकरी बची है, उन्हें इस परीक्षा की अनिवार्यता से पूरी तरह मुक्त रखा जाएगा। लेकिन जो शिक्षक इस दायरे से बाहर हैं, उनके लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है।

 उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में तैनात 52 वर्षीय शिक्षक सुरेश भट्ट पिछले 28 सालों से बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं। इतनी लंबी सेवा देने के बावजूद, उन्हें अपनी नौकरी सुरक्षित रखने के लिए 31 अगस्त 2028 तक हर हाल में टीईटी पास करना होगा। 52 साल की उम्र में, जब व्यक्ति अपनी रिटायरमेंट की प्लानिंग करता है, तब सुरेश भट्ट जैसे वरिष्ठ शिक्षकों को अब नए सिरे से प्रतियोगी परीक्षा के सिलेबस और किताबों से जूझना पड़ रहा है, जिससे उनके अंदर गहरा मानसिक तनाव और परीक्षा को लेकर एक परेशानी पैदा हो गई है।

 राहत के लिए शिक्षक संगठनों की मांगें

इस बड़े संकट से उबरने और शिक्षा व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने के लिए विभिन्न शिक्षक संघों ने सरकार के सामने अपनी मांगें रखी हैं। शिक्षक संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि आगामी मानसून सत्र में अध्यादेश या आवश्यक विधायी संशोधन लाकर इन अनुभवी शिक्षकों को स्थायी राहत दी जाए। इसके साथ ही, कई राज्यों में इन पुराने शिक्षकों के लिए विभाग स्तर पर एक अलग परीक्षा आयोजित करने और उनकी उम्र को देखते हुए ‘मिनिमम क्वालिफाइंग मार्क्स’ (न्यूनतम पासिंग अंक) को कम करने पर भी गंभीरता से विचार चल रहा है। अब देखना यह होगा कि सरकारें इन अनुभवी शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए क्या बीच का रास्ता निकालती हैं।

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