उत्तर प्रदेश के परिषदीय अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में प्रस्तावित समायोजन प्रक्रिया को लेकर शिक्षकों के बीच असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। इस विषय पर पूर्व अधिवक्ता एवं टीम पहल उत्तर प्रदेश के संस्थापक अनुराग सिंह ने ‘फर्स्ट इन फर्स्ट आउट’ (FIFO) प्रक्रिया को पूरी तरह अनुचित और शिक्षा व्यवस्था के लिए नुकसानदायक बताया है।
जारी किए गए एक विस्तृत प्रस्तुतीकरण में कहा गया है कि प्रदेश में कई ऐसे विद्यालय थे जहाँ छात्र संख्या कम होने के बावजूद उन्हें अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में परिवर्तित कर प्रत्येक विद्यालय में पाँच शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी। जबकि कई स्थानों पर पहले से ही छात्र-शिक्षक अनुपात के अनुसार पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध थे। आरोप है कि इसके बावजूद आरटीई एक्ट की मूल भावना के विपरीत अतिरिक्त नियुक्तियाँ की गईं।
प्रस्तुतीकरण में यह भी कहा गया है कि वर्तमान समायोजन प्रक्रिया में केवल यह देखा जा रहा है कि किस शिक्षक की नियुक्ति बाद में हुई, जबकि यह नहीं देखा जा रहा कि विद्यालय में बच्चों की संख्या कितनी है और किस अध्यापक की वास्तविक आवश्यकता है। इससे उन शिक्षकों पर समायोजन का भार पड़ रहा है जिन्हें विभागीय निर्णयों के कारण बाद में नियुक्त किया गया था।
अनुराग सिंह का तर्क है कि यदि अतिरिक्त नियुक्तियाँ विभागीय निर्णयों के कारण हुई थीं तो उसकी जिम्मेदारी शिक्षकों पर नहीं डाली जानी चाहिए। उनका कहना है कि विभाग को अपनी पूर्व की त्रुटियों को स्वयं सुधारना चाहिए और मूल शिक्षकों को प्रभावित नहीं करना चाहिए।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि नामांकन बढ़ाने वाले विद्यालयों और शिक्षकों को भविष्य में समायोजन या स्थानांतरण के रूप में दंडित किया गया, तो इससे विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने की प्रेरणा समाप्त हो सकती है। इससे शिक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
प्रस्तुतीकरण में यह मांग भी उठाई गई है कि इस समायोजन प्रक्रिया को न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए, अन्यथा यह बेसिक शिक्षा व्यवस्था को दीर्घकालिक क्षति पहुँचा सकती है। साथ ही शिक्षकों के साथ न्यायपूर्ण नीति अपनाने और शिक्षा के हित में संतुलित निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
मुख्य प्रश्न:
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विभागीय त्रुटि की सजा शिक्षकों को क्यों मिले?
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अतिरिक्त नियुक्तियाँ यदि विभाग की थीं, तो समायोजन का भार मूल शिक्षकों पर क्यों डाला जाए?
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क्या ऐसी प्रक्रिया भविष्य में विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने के प्रयासों को प्रभावित करेगी?
शिक्षक संगठनों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच यह मुद्दा तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है।
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