इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में कहा है कि बुजुर्ग माता-पिता के साथ क्रूरता, उपेक्षा या उनका परित्याग संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानपूर्वक जीवन जीने के उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों के लिए बुजुर्ग माता-पिता की गरिमा, कल्याण और देखभाल की रक्षा करना पवित्र नैतिक कर्तव्य और वैधानिक दायित्व दोनों है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब पुत्रवत कर्तव्य समाप्त हो जाता है, तो न्यायालयों को कमजोर बुजुर्गों की रक्षा के लिए करुणा के अंतिम गढ़ के रूप में उभरना चाहिए।
यह आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी एवं न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने 75 वर्षीय राम दुलार गुप्ता की याचिका पर दिया है। खंडपीठ ने कहा कि जैसे-जैसे बुजुर्ग माता पिता की शारीरिक शक्ति कम होती जाती है और बीमारियां बढ़ती जाती हैं, माता-पिता दान नहीं बल्कि उन्हीं हाथों से सुरक्षा, सहानुभूति और साथ चाहते हैं, जिन्हें उन्होंने कभी थामा था और जिनका पालन-पोषण किया था। याचिका में याची ने उसकी भूमि अधिग्रहण किए जाने पर मुआवजे के रूप में 21 लाख रुपये से अधिक की राशि जारी करने का निर्देश देने की मांग की थी। जबकि मुआवजे का आकलन पहले ही किया जा चुका था और गत 16 जनवरी को भुगतान नोटिस जारी किया गया था लेकिन याची के बेटों द्वारा विवाद के कारण राशि का भुगतान नहीं किया गया। बेटों ने भूमि पर बने भवन में सह-स्वामित्व का दावा किया था। कोर्ट ने कहा कि याची के दो बेटों ने अपने पिता को मुआवजे के पूर्ण वितरण का विरोध किया था क्योंकि उन्होंने तर्क दिया था कि उन्होंने भी भवन निर्माण में योगदान दिया था।
दूसरी ओर याची का कहना था कि पूरा भवन उनके अपने संसाधनों से बनाया गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुआवजे की घोषणा के बाद उनके बेटों ने उन्हें गंभीर मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार बनाया। उन्होंने अपने बेटों के हाथों से लगी चोटें भी दिखाईं। याची ने कोर्ट में उपस्थित होकर दावा किया कि जैसे ही मुआवजे की घोषणा की गई, उसके बाद से ही याची के बच्चे उसके साथ आक्रामकता और क्रूरता का व्यवहार करने लगे। बेटों के इस आचरण के बावजूद याची ने अपनी इच्छा से मुआवजे का एक हिस्सा बेटों के साथ बांटने की इच्छा व्यक्त की। कोर्ट में बेटों ने बिना शर्त माफ़ी भी मांगी और आश्वासन दिया कि ऐसा व्यवहार दोबारा नहीं होगा।
पारिवारिक गोपनीयता की आड़ में मूक पीड़ा जारी रखने की अनुमति नहीं
कोर्ट ने कहा कि एक घर जो बुजुर्ग माता-पिता के लिए प्रतिकूल हो गया है, वह अब आश्रय नहीं है। यह अन्याय का स्थल है। न्यायालयों को पारिवारिक गोपनीयता की आड़ में इस मूक पीड़ा को जारी रखने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। कोर्ट ने याची के अधिग्रहित भूमि के निर्विवाद मालिक होने और दोनों पक्षों के आश्वासन को ध्यान में रखते हुए आदेश दिया कि बिना किसी और देरी के याची के पक्ष में मुआवजा जारी किया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में बेटों ने कोई हस्तक्षेप किया तो याची को पुनः न्यायालय जाने की स्वतंत्रता होगी और न्यायालय सख्त आदेश करेगा।
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