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विशेष रिपोर्ट: ‘स्कूल चलो अभियान’ के दावों के बीच बदहाल रास्ते, कीचड़ और गड्ढों से होकर भविष्य गढ़ने को मजबूर छात्र

मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग द्वारा हर साल अप्रैल और जुलाई के महीनों में ‘स्कूल चलो अभियान’ चलाकर छात्र संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। शासन की मंशा है कि हर बच्चा स्कूल पहुँचे, लेकिन हकीकत यह है कि जिले के दर्जनों विद्यालयों तक पहुँचने वाले मार्ग ही बच्चों के लिए सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। एक ओर विभाग नामांकन के आंकड़ों में उलझा है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचे की अनदेखी ने छात्रों और अभिभावकों की मुसीबत बढ़ा दी है।

आंकड़ों में बदहाली: 60 स्कूलों के रास्ते खस्ताहाल

जिले में वर्तमान में 1809 परिषदीय और 120 राजकीय व अनुदानित माध्यमिक विद्यालय संचालित हैं। विभागीय सर्वेक्षण और शिकायतों के आधार पर:

  • 45 बेसिक विद्यालय और 15 माध्यमिक विद्यालयों तक पहुँचने वाले मार्ग पूरी तरह जर्जर हैं।

  • कहीं सड़कों पर गहरे गड्ढे हैं, तो कहीं जलभराव और कीचड़ ने रास्तों को पैदल चलने लायक भी नहीं छोड़ा है।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में अतिक्रमण की स्थिति यह है कि स्कूली रास्तों पर ही मवेशी बाँधे जा रहे हैं।

वीआईपी मार्गों का भी बुरा हाल

बदहाली की तस्वीर केवल सुदूर गाँवों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर के मुख्य कार्यालयों के पास भी स्थिति दयनीय है।

  • राजकीय इंटर कॉलेज (जीआईसी): महुवरिया स्थित इस कॉलेज का मुख्य मार्ग तहसील चौराहा तक जाता है। मात्र दो किलोमीटर के इस सफर में सैकड़ों गड्ढे हैं। विडंबना यह है कि इसी मार्ग पर जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) कार्यालय और सदर तहसील जैसे महत्वपूर्ण दफ्तर स्थित हैं।

  • विंध्याचल राजकीय बालिका इंटर कॉलेज: यहाँ जाने वाले मार्ग पर मवेशियों का जमावड़ा रहता है। कई बार छात्राएं मवेशियों के हमले का शिकार भी हो चुकी हैं, जिससे अभिभावकों में सुरक्षा को लेकर डर बना रहता है।

ब्लॉक स्तर पर भी चुनौतियां

जिले के लालगंज, हलिया, पटेहरा और कोन विकास खंडों में कई ऐसे विद्यालय हैं जहाँ बारिश के दिनों में पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं होता। जलभराव के कारण छात्र स्कूल जाने से कतराते हैं, जिसका सीधा असर उनकी उपस्थिति और शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

बिना सुगम मार्ग के कैसे सफल होगा अभियान?

अभिभावकों का कहना है कि एक ओर सरकार बच्चों को स्कूल भेजने के लिए जागरूक कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन इन बदहाल रास्तों की मरम्मत के प्रति उदासीन है। यदि स्कूल पहुँचने का रास्ता ही सुरक्षित और साफ नहीं होगा, तो नामांकन बढ़ाने के प्रयास केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे। स्थानीय निवासियों ने माँग की है कि ‘स्कूल चलो अभियान’ के साथ-साथ ‘सड़क सुधार अभियान’ भी चलाया जाए ताकि नौनिहालों का सफर आसान हो सके।

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