TET के सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट के दिनांक 1 सितंबर 2025 के आदेश के सम्बंध में शिक्षकों का पक्ष रखे जाने हेतु अभ्यावेदन
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सादर अनुरोध है कि
– विगत वर्ष से सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश दिनांक 1 सितंबर 2025 के अनुसार प्रदेश के 1. 50 लाख से अधिक शिक्षकों को जबरदस्ती TET के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है उस आदेश को ध्यान से पढ़ने के बाद यह प्रश्न सामने आ रहा है कि देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति या राष्ट्रीय कानून बड़ा है कि न्यायालय , जिसने कानून का मनमाना भाष्य किया है और इसी कारण प्रदेश भर के शिक्षक पिछले कई महीनों से परेशान हो रहे हैं.
– अभी सुप्रीम कोर्ट में निर्णीत जिस सिविल अपील संख्या 1385 /2025 के निर्णय का पालन करने का प्रयास किया जा रहा है असल में वह सिविल अपील निर्णय के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ( CJ I ) के पास उचित निर्देश के लिए ( निर्णय के बिंदु क्रमांक 211 के अनुसार ) अग्रेषित हुई है.
– सिविल अपील 1385 स्कूल शिक्षा निदेशक चेन्नई एवं अन्य बनाम बी एनी paikiyarani बाई से संबंधित निर्णय दिनांक 28 जनवरी 2025 के माध्यम निर्धारित मुद्दों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई से संबंधित है.
– इस तथ्य को आदेश के बिंदु 2 में प्रस्तुत किया गया है. इस अपील के बिंदु 3 में कहा गया है कि 28 जनवरी 2025 के आदेश में विचार के लिए 2 मुद्दे उठाए गए थे –
1- क्या राज्य इस बात पर जोर दे सकता है कि किसी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान में नियुक्ति चाहने वाले शिक्षक को TET( शिक्षक पात्रता परीक्षा)उत्तीर्ण करना अनिवार्य है ? यदि हां, तो क्या ऐसी योग्यता की शर्त लगाने से भारत के संविधान के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों को गारंटीकृत किसी भी अधिकार पर कोई प्रभाव पड़ेगा ?
2- क्या वे शिक्षक, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद ( NCTE) द्वारा 29 जुलाई 2011 को जारी अधिसूचना संख्या 61-1/2011/NCTE(N&S) से काफी पहले हुई थी- जो RTE अधिनियम की धारा 23 की उपधारा (1) के तहत तथा धारा 23(2) में हाल ही में जोड़े गए परंतुक ( दूसरा परंतुक) के साथ पठित है- और जिनके पास शिक्षण का वर्षों का अनुभव ( मान लीजिए, 25 से 30 वर्ष) है, उन्हें पदोन्नति के लिए पात्र माने जाने हेतु TET उत्तीर्ण करना आवश्यक है ?
– यही 2 मुद्दे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष थे जिनके निर्णय के लिए अपील 1385 /2025 और 1386 /2025 है जिसमें मुख्य रूप से जिस निर्णय को चुनौती दी गई है उसमें याचिकाकर्ता आजाद एजुकेशन सोसायटी, मिराज ( एक अल्पसंख्यक संस्थान) द्वारा दायर याचिका में उस सरकारी प्रस्ताव को चुनौती दी गई थी जिसके तहत महाराष्ट्र सरकार ने प्राथमिक शिक्षा देने वाले स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए TET योग्यता को अनिवार्य शर्त बना दिया था. बाम्बे हाई कोर्ट ने इस प्रस्ताव पर विचार किया और इसे सही ठहराया था और यह मानते हुए कि चुनौती दिया गया सरकारी प्रस्ताव, अल्पसंख्यक संस्थानों के अपनी पसंद के शिक्षकों को नियुक्त करने के अधिकार पर कोई रोक नहीं लगाता है बशर्ते कि वे TET योग्य उम्मीदवार होने के नाते पात्र पाए जाएं.
– इस निर्णय के विरुद्ध संबंधित संस्था की ओर से कोई अपील दायर नहीं की गई लेकिन इसी मामले में अंजुमन एजुकेशन सोसायटी, मिराज द्वारा उक्त फैसले के विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका दायर की गई जिसकी अपील संख्या 1385/2025 है.
– इसी फैसले के विरुद्ध एक और विशेष अनुमति याचिका एसोसिएशन ऑफ उर्दू एजुकेशन सोसाइटीज द्वारा दायर हुई जो सिविल अपील संख्या 1386/2025 है.
– सुप्रीम कोर्ट के जिस निर्णय दिनाँक 1 सितंबर 2025 के माध्यम से देश भर के शिक्षकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है सही मायने में अभी उनका निर्णय ही नहीं हुआ है अपितु इसी निर्णय के बिंदु 211 में लिखा गया है कि
” रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि वह सिविल अपील संख्या 1364 – 1367, 1385-1386 और 6364/2025 को माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उचित निर्देशों के लिए प्रस्तुत करे.”
– इसी बिंदु के अनुसार सिविल अपील संख्या 1364-1367 के माध्यम से मुख्य रूप से उस प्रकरण का निराकरण किया जाना था जिसमें एक अल्पसंख्यक संस्था बांबे मेमन एजुकेशन सोसाइटी द्वारा संचालित एक स्कूल में नियुक्त 4 शिक्षकों को 2018 में ग्रेटर मुंबई म्युनिसिपल कार्पोरेशन ( MCGM) ने अपने एजुकेशन डिपार्टमेंट के जरिए 30 मार्च 2019 तक TET क्वालीफाई करने के बारे में बताया और उन शिक्षकों की सर्विस खत्म करने के निर्देश दिए जो इसका पालन करने में नाकाम रहे. इन शिक्षकों ने जब अपनी याचिका बांबे हाई कोर्ट में लगाई तो उन्हें कोर्ट ने MCGM के निर्देशों पर अंतरिम रोक लगाकर राहत प्रदान की.
– इससे नाराज हो कर ही MCGM ने सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की थी.
– एक और सिविल अपील 6364 में एक अल्पसंख्यक संस्थान द्वारा नियुक्त ऐसे शिक्षक की नियुक्ति की वैधता पर हाई कोर्ट मद्रास ( तमिलनाडु) ने निर्णय दिया है जिसने TET परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी जिसके आधार पर राज्य के शिक्षा अधिकारी ने उसकी नियुक्ति को मंजूरी देने से इंकार कर दिया था.
– कोर्ट ने कहा था कि RTE एक्ट अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि संस्था के शिक्षक को TET पास करने की जरूरत नहीं है साथ ही शिक्षा विभाग को शिक्षक की नियुक्ति की मंजूरी के निर्देश दिए गए.
– 1 सितंबर 2025 के निर्णय के बिंदु 214 – 219 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने जिन याचिकाओं पर आदेश दिया है वे सिविल अपील नंबर 1389,1390,1391,1393,1395,1396,1397,1398,1399,1401,1403,1404,1405,1406,1407,1408,1409,1410/2025 हैं.
– इन अपीलों में मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसके अनुसार यह फैसला सुनाया गया था कि-
” कोई भी शिक्षक जिसे 29 जुलाई 2011 से पहले सेकेंडरी ग्रेड शिक्षक या ग्रेजुएट शिक्षक/ BT असिस्टेंट के तौर पर नियुक्त किया गया था, वह अपनी सेवा जारी रख सकता है और वेतन वृद्धि तथा प्रोत्साहन प्राप्त कर सकता है. हालांकि, पदोन्नति की इच्छा रखने वाले शिक्षकों के लिए TET योग्यता होना अनिवार्य था. कोर्ट ने कहा था कि 29 जुलाई 2011 के बाद सेकेंडरी ग्रेड शिक्षक के पद पर की गई सभी नियुक्तियां ऐसे उम्मीदवारों को ही होनी चाहिए जिनके पास TET योग्यता हो.
– इसी तरह 29 जुलाई 2011 के बाद BT असिस्टेंट/ ग्रेजुएट शिक्षक के पद पर की गई सभी नियुक्तियां- चाहे वे सीधी भर्ती के जरिए हों या पदोन्नति के जरिए- उन्हें भी TET की शर्त को पूरा करना होगा.”
मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु स्कूल शिक्षा अधीनस्थ सेवा के लिए 30 जनवरी 2020 को जारी विशेष नियमों के उस हिस्से को रद्द कर दिया गया जिसमें ‘ शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET ) उत्तीर्ण करना ‘ केवल सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य बताया गया था, न कि पदोन्नति के लिए, परिणामस्वरूप, पदोन्नति के जरिए नियुक्ति के लिए भी TET को अनिवार्य घोषित कर दिया गया.
– अल्पसंख्यक संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए TET उत्तीर्ण करने की शर्त के सम्बंध में कोर्ट ने कहा कि TET के नियम अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होंगे चाहे वे सरकारी सहायता प्राप्त हों या बिना सरकारी सहायता प्राप्त.
– निर्णय के बिंदु 60 में कहा गया है कि RTE एक्ट की धारा 23 केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि वह किसी प्राधिकरण को यह अधिकार दे कि वह शिक्षक के तौर पर नियुक्त होने के लिए पात्र होने हेतु ‘ न्यूनतम योग्यताएं ‘ निर्धारित करे.
– निर्णय के बिंदु 61 के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा 31 मार्च 2010 को NCTE को शैक्षणिक प्राधिकरण के तौर पर नियुक्त किया गया.
– निर्णय के बिंदु 63 के अनुसार NCTE ने अपनी अधिसूचना दिनाँक 23 अगस्त 2010 के माध्यम से, RTE एक्ट की धारा 2 के खंड ( n) में उल्लिखित किसी स्कूल में कक्षा 1 से 8 तक शिक्षक के तौर पर नियुक्ति के लिए पात्र होने हेतु किसी व्यक्ति के लिए न्यूनतम योग्यताएं निर्धारित की. इसी समय TET को पहली बार अनिवार्य बनाया गया.
इसी बिंदु में “न्यूनतम योग्यताएं ” के उपबंध
” 4 इस नोटिफिकेशन की तारीख से पहले नियुक्त टीचर – इस नोटिफिकेशन की तारीख से पहले क्लास 1 से 8 के लिए नियुक्त टीचरों की नीचे दी गई केटेगरी के टीचरों को ऊपर पैरा (1) में बताई गई मिनिमम क्वालीफिकेशन हासिल करने की जरूरत नहीं है.( 1) 3 सितंबर 2001 को या उसके के बाद नियुक्त टीचर .
(2) 3 सितंबर 2001 से पहले appointment किया गया टीचर, मौजूदा रिक्रूटमेंट रूल्स के अनुसार.
– इसी निर्णय के बिंदु 64 से 163 तक विद्वान न्यायाधीशों ने विभिन्न तरीकों से अपने – अपने तर्कों को स्थापित करते हुए सेवारत उन शिक्षकों को भी TET के दायरे में लाने के लिए आधार तय कर लिए जिन्हें NCTE की अधिसूचना दिनाँक 23 अगस्त 2010 में स्पष्ट रूप से छूट दी गई है.
– निर्णय के बिंदु 164 से 170 तक का अवलोकन करने पर यह एकदम से स्पष्ट हो जाता है कि निर्णय को अपने मनमाफिक (अनुरूप) बनाने के लिए किस तरह अधिसूचना दिनाँक 23 अगस्त 2010 के विरुद्ध लिखा गया है कि-
” जो सेवारत शिक्षक पदोन्नति की आकांक्षा रखते हैं – चाहे उनकी सेवा अवधि कितनी भी क्यों न हो- उन्हें पदोन्नति के लिए अपनी उम्मीदवारी पर विचार किए जाने हेतु पात्र बनने के लिए TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य है.”
– यहां पर यह विचारणीय है कि विद्धान न्यायाधीशों ने पदोन्नति के लिए TET को अनिवार्य बताया है न कि सेवा में बने रहने के लिए भी ?
– हमारे निष्कर्ष के रूप में लिखते हुए विद्धान न्यायाधीशों ने मुख्य रूप से अनुच्छेद 21 ए और 30 (1) के बीच माने गए टकराव और अल्पसंख्यक संस्थानों पर RTE अधिनियम लागू होने की स्थिति के बारे में बिंदु 171 से 177 तक व्याख्या की है.
– इसी निर्णय के बिंदु 178 से 191 तक अल्पसंख्यक संस्थानों पर RTE अधिनियम की धारा 12 (1)(c) की प्रयोज्यता के सम्बंध में लिखा गया है.
– न्यूनतम योग्यता की आवश्यकता- लिखते हुए कहा गया है कि- ” क्या यह सेवारत शिक्षकों पर लागू होती है ? ” के बारे में निष्कर्ष निकाला गया है कि नियुक्ति का अर्थ केवल प्रारंभिक नियुक्ति ही नहीं; पदोन्नति के माध्यम से नियुक्ति भी है.
– निर्णय के बिंदु 200 में जो कहा गया है वह ही इस शिक्षक विरोधी निर्णय का प्रमुख आधार बनाया गया है.
– ” TET न्यूनतम योग्यता है कि पात्रता ” पर विचार करते समय विद्वान न्यायाधीश ने इस बात को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया कि RTE 2009 के अनुपालन में जारी NCTE की अधिसूचना दिनांक 23 अगस्त 2010 में अधिसूचना जारी होने के पूर्व नियुक्त शिक्षकों ( सेवारत शिक्षकों को) को आखिर न्यूनतम योग्यताओं ( TET ) को हासिल करने से मुक्त क्यों रखा गया होगा ? क्या यह बेहतर नहीं होता कि निर्णय लेने के पहले न्यायालय में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों सहित NCTE के अधिकारियों को भी अपना पक्ष रखने के लिए आमंत्रित किया जाता. क्या ऐसा किए बगैर कोई निर्णय न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है ?
– सरकार को सुनें बगैर ही समूचे देश के शिक्षकों के लिए TET परीक्षा उत्तीर्ण करने का यह निर्णय इसी कारण विवादास्पद बन गया है.
– इस निर्णय के बिंदु 206 में ही अपने गुण दोष के आधार पर कह दिया गया कि-
– ” अतः हम यह मानते हैं कि TET उन न्यूनतम योग्यताओं में से एक है जिन्हें RTE अधिनियम की धारा 23 के तहत निर्धारित किया जा सकता है. ”
हाँ! यह सही है लेकिन यह अधूरा सच है.
– RTE- 2009 के अनुरूप जारी अधिसूचना 23 अगस्त 2010 इसी अर्थ में अत्यंत महत्वपूर्ण है कि उसमें इसमें सेवारत शिक्षकों को TET यानि कि न्यूनतम योग्यता हासिल करने की आवश्यकता नहीं होगी – कहा गया है.
– आखिर इस तथ्य की उपेक्षा के लिए उत्तरदायी कौन है ?
– इसी विचार बिंदु में यह भी शामिल किया जा सकता है जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह निर्णय लिया जाना चाहिए कि क्यों न देश के सभी राज्यों के उन शिक्षा अधिकारियों को भी दण्डित किया जाए जिन्होंने इतनी लंबी अवधि तक (15 वर्ष तक) सभी शिक्षकों को TET उत्तीर्ण करने के लिए आदेशित नहीं किया ? साथ ही यह भी विचारणीय है कि क्या कानून बनाने वालों से कानून का भाष्य करने वाले लोग और संस्थाएं ज्यादा बड़े और समझदार हैं ?
अंततः बिंदु 211 में निर्देश दिए गए हैं कि सिविल अपील 1364-1367,1385-1386 और 6364/ 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश की ओर उचित निर्देश के लिए प्रस्तुत किया जाए .
– इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जो सिविल अपील 1385 / 2025 (निर्णय की प्रत्याशा में )निर्णय के लिए भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश को उचित निर्देश के लिए प्रस्तुत की गयी थी वह अभी निर्णीत ही नहीं हुई है जबकि बिंदु 212 के अनुसार सिविल अपील 6365- 6367/2025 को यह कह कर निर्णीत कर दिया गया है कि यह तो अल्पसंख्यक संस्था का प्रकरण है यदि ऐसा है तो इसे भी निर्णय के रूप में ध्वनित किया जाना चाहिए था ताकि ” अल्पसंख्यक संस्थान RTE से मुक्त हैं ” यह सार्वजानिक रूप से स्पष्ट हो जाता.
– सेवारत शिक्षकों पर TET की प्रयोज्यता के सम्बंध में इस निर्णय के बिंदु 214 – 215 में यह लिखा गया है कि ” अल्पसंख्यक संस्थानों के अलावा सभी स्कूल में कार्यरत शिक्षक ( सेवारत शिक्षक ) जो अभी सेवा में हैं ( उनकी सेवा की अवधि चाहे कितनी भी हो) उन्हें आगे सेवा में बने रहने के लिए TET पास करना जरूरी है..”
– माननीय न्यायालय ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उन्हें प्राप्त विशिष्ट शक्तियों के अनुरूप जो निर्णय बिंदु क्रमांक 216- 218 में दिया है उसी को मान्य करते हुए राज्यों द्वारा यह निर्णय लिया जा रहा है कि निर्णय के बाद 2 साल के अंदर प्रदेश में कार्यरत (सेवारत ) सभी शिक्षकों को ( जिनकी सेवा अवधि 5 साल से अधिक रह गई है ) TET उत्तीर्ण करने की जरूरत है अन्यथा वे अपनी भावी सेवा (सर्विस) खो देंगे.
– यह कैसी बेबस बिडम्बना है कि भारत की जनता (और सरकार भी ) अपने साथ हुए अन्याय से मुक्ति के लिए अंततः न्यायालयों की शरण में जाते हैं कि उन्हें अन्याय से मुक्ति मिलेगी लेकिन यह अपील प्रकरण इस सन्दर्भ में अन्याय का कारक बन गया है जिसे भूतकाल से कठोरतापूर्वक लागू करने के लिए निर्देशित किया गया है.
– इस पूरे अपील प्रकरण क्रमांक 1385 / 2025 को यदि ध्यान से पढ़कर समझा जाए तो देश के लगभग 20 लाख से अधिक सेवारत शिक्षकों को NCTE की अधिसूचना दिनाँक 23 अगस्त 2010 जारी होने से पूर्व 20 – 25 साल से कार्यरत होने की स्थिति में प्राप्त छूट का लाभ मिल सकता है.
– यह निर्णय भारत के मुख्य न्यायाधीश के द्वारा किया जा सकता है जिनके पास सिविल अपील 1385 /2025 में उचित निर्णय लेने का अधिकार अभी भी सुरक्षित है.
– यह विचारणीय है कि आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट शिक्षकों के विरुद्ध निर्णय ले रहा है ? और भारतीय कानून का पालन करने की अपेक्षा उसका मनमाना भाष्य कर रहा है.
– अब सरकार का यह प्रमुख कर्त्तव्य है कि वह अपने शिक्षकों की रक्षा करे क्योंकि उनकी भर्ती ( नियुक्ति) सरकार ने ही की है. यदि सरकारी तंत्र द्वारा नियुक्त शिक्षक TET उत्तीर्ण करने के अभाव में अयोग्य घोषित किए जा रहे हैं तो इसका असर भारतीय शिक्षा मंत्रालय की काबिलियत पर भी पड़ना चाहिए.
– अतः सिविल अपील क्रमांक 1385 / 2025 का निर्णय शिक्षकों के लिए जारी अधिसूचना दिनाँक 23 अगस्त 2010 के अनुरूप TET से छुट के साथ कार्यवाही का निर्णय कराया जाए .
C/p
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