इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि परीक्षा के बाद सेंटर में जमा कॉपी बदल जाने के लिए सीधे छात्रों को दोषी नहीं माना जा सकता बशर्ते उनके खिलाफ कॉपी बदलने का साक्ष्य न हो। कोर्ट ने कहा कि साक्ष्यों के आधार पर अपराध को संदेह से परे साबित किए बगैर केवल अवधारणा के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा आरोप के नोटिस का छात्रों से जवाब लेकर विधिवत जांच में आरोप सिद्ध हुए बगैर उन्हें सामूहिक नकल का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा सीबीएसई बोर्ड साबित नहीं कर सका कि याचियों ने अपनी परीक्षा की कॉपी बदली है। जांच कमेटी यह नहीं कह सकती कि याचियों की उत्तर पुस्तिका पर हस्तलेख भिन्न, है क्योंकि वह हस्तलेख विशेषज्ञ नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक सरन ने शौर्य तिवारी व 10 अन्य छात्रों की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। इसी के साथ कोर्ट ने अपराध साबित किए बिना अवधारणा पर छात्रों को सामूहिक नकल का दोषी ठहराने और उन्हें तीन साल के लिए हाईस्कूल परीक्षा में बैठने से रोकने के बोर्ड के 14 अगस्त 2025 के एकपक्षीय आदेश को रद्द करते हुए 15 दिन में याचियों का 2025 की हाईस्कूल परीक्षा परिणाम घोषित करने का निर्देश दिया है।
याचियों की अधिवक्ता अंजली उपाध्याय का कहना था कि चाणक्य पब्लिक स्कूल मेजा प्रयागराज में हाईस्कूल के छात्र याचियों ने एमएल पब्लिक स्कूल सिरसा मेजा से हाईस्कूल की परीक्षा दी। 13 मई 2025 को परीक्षा परिणाम घोषित हुआ लेकिन याचियों का परीक्षा परिणाम रोक लिया गया। बोर्ड की एक कमेटी ने याचियों को बुलाया। कमेटी ने याचियों से सादे कागज पर हस्ताक्षर लिए। कोई चार्जशीट नहीं दी, न जवाब लिया और न व्यक्तिगत सुनवाई की। एकपक्षीय आदेश से तीन साल के लिए बोर्ड परीक्षा देने से रोक का आदेश कर दिया। उन्होंने कहा कि यह सीबीएसई के नियमों व नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का खुला उल्लघंन है। बोर्ड का आरोप था कि परीक्षा के बाद सेंटर पर याचियों की कॉपी बदल दी गई। दो कॉपियां पाई गईं, जिनमें अन्य के भी उत्तर समान थे।
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