ओबीसी की गणना के लिए ड्रॉप डाउन की सुविधा देना मुश्किल, राज्यों में अलग-अलग वर्गीकरण से बढ़ी चुनौती
नई दिल्ली। आगामी जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की जातिगत गणना को लेकर सरकार के सामने तकनीकी और प्रशासनिक चुनौती सामने आ सकती है। ओबीसी की गणना के लिए ड्रॉप डाउन सुविधा देने की मांग उठ रही है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में जातियों का वर्गीकरण अलग होने के कारण इसे लागू करना आसान नहीं माना जा रहा है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जनगणना में ओबीसी के लिए जातियों की गणना तथा ड्रॉप डाउन की सुविधा देने की मांग की है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी व्यवस्था लागू करना जटिल हो सकता है।
एक राज्य में ओबीसी, दूसरे में सामान्य वर्ग
जातियों के वर्गीकरण में राज्यों के बीच बड़ा अंतर है। उदाहरण के तौर पर किसी जाति को बिहार या उत्तर प्रदेश में ओबीसी वर्ग में रखा गया हो सकता है, जबकि हरियाणा जैसे किसी अन्य राज्य में वही जाति सामान्य वर्ग में शामिल हो सकती है। ऐसे में राज्यवार वर्गीकरण के आधार पर ड्रॉप डाउन सूची तैयार करना चुनौतीपूर्ण होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ड्रॉप डाउन में जातियों की सूची दी जाती है तो उसे किस आधार पर तैयार किया जाएगा, यह बड़ा सवाल होगा। राष्ट्रीय स्तर पर एक समान सूची बनाना इसलिए मुश्किल है क्योंकि राज्यों में जातियों की सामाजिक और प्रशासनिक श्रेणियां अलग-अलग हैं।
2012 की सामाजिक-आर्थिक जातीय जनगणना का भी संदर्भ
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2012 की सामाजिक-आर्थिक जातीय जनगणना में ड्रॉप डाउन की सुविधा नहीं दी गई थी। लोगों को अपनी जाति लिखने का विकल्प दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में अलग-अलग नाम और वर्तनी सामने आई थीं, जिससे आंकड़ों को व्यवस्थित करना चुनौतीपूर्ण हो गया था।
जाति बताने के विकल्प पर भी चर्चा
विशेषज्ञों के अनुसार, जाति गणना को आसान बनाने के लिए ड्रॉप डाउन के बजाय लोगों को अपनी जाति बताने का विकल्प देना एक रास्ता हो सकता है। हालांकि, इसके बाद प्राप्त आंकड़ों को प्रमाणित और वर्गीकृत करने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है।
राजीव कुमार के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि जातियों की गणना से भारत की जातीय व्यवस्था की सही तस्वीर सामने आ सकती है। वहीं यह भी तर्क दिया गया है कि देश में जाति व्यवस्था स्थिर नहीं है और समय के साथ सामाजिक पहचान एवं वर्गीकरण में बदलाव होते रहे हैं।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें देशभर में जातियों की गणना हो सके और राज्यों के अलग-अलग वर्गीकरण के बावजूद आंकड़ों को एक समान राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित किया जा सके।
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