यूपी परिषदीय विद्यालयों में प्रधानाध्यापक पद सृजन की मांग, RTE एक्ट और हाईकोर्ट के फैसले का दिया हवाला
वर्तमान में बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश के अधीन संचालित परिषदीय विद्यालयों में से अधिकांश विद्यालयों में प्रधानाध्यापक का पद सृजित नही है। उक्त के सम्बंध में RTE के प्राविधानों का जिक्र करते हुए प्राथमिक विद्यालय में 150 या उससे कम छात्र संख्या एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 100 या उससे कम छात्र संख्या होना बताया जाता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम में निहित प्राविधान के अनुसार “60 से कम छात्र संख्या होने पर 2 शिक्षक रहेंगे”। इसमें यह नही लिखा गया है कि दोनों सहायक अध्यापक रहेंगे या कोई प्रधानाध्यापक नही रहेगा। शिक्षक शब्द की परिभाषा को वृहद रूप में देखने पर उसमे सहायक शिक्षक व प्रधान शिक्षक दोनो ही पद समाहित है। उसके साथ ही RTE एक्ट में यह भी प्राविधान है, कि प्राथमिक विद्यालयो में 150 से अधिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 100 से अधिक छात्र संख्या होने पर प्रधानाध्यापक अतिरिक्त होगा। इसका अर्थ यह लिया जाना विधिसम्मत होगा कि 150 अथवा 100 से कम छात्र संख्या होने पर प्रधानाध्यापक की गिनती शिक्षक संख्या में शामिल है एवं उक्त से ज्यादा संख्या होने पर प्रधानाध्यापक की गिनती शिक्षक संख्या से अलग होगी। अर्थात उच्च प्राथमिक विद्यालय में 100 से कम छात्र संख्या होने पर प्रधानाध्यापक ptr के अंतर्गत गिना जाएगा और 100 से अधिक संख्या होने पर ptr के अंतर्गत प्रधानाध्यापक को नहीं गिना जाएगा।यही स्थिति प्राथमिक विद्यालय में 150 से कम की स्थिति में होगी।
वर्तमान में प्रत्येक विद्यालय में प्रधानाध्यापक पद की मुहर इस्तेमाल हो रही है। विद्यालय एक संस्था है, संस्था का सचिव प्रधानाध्यापक पदेन होता है। प्रभारी भी प्रधानाध्यापक पद के सापेक्ष ही कार्य कर रहा है।
उक्त के संबंध में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा त्रिपुरारी दुबे के केस में उल्लेख किया गया है कि
सामान्यतः, किसी शैक्षणिक संस्थान के लिए कोई न कोई पर्यवेक्षी प्राधिकारी (supervising authority) होता ही है। आमतौर पर, यह प्रधानाध्यापक या प्रधानाचार्य ही होता है जिसे संस्थान के मामलों के संबंध में पर्यवेक्षण और निर्णय लेने आदि सहित विभिन्न कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। यदि यह मान लिया जाए कि प्रधानाध्यापक का कोई पद ही नहीं है, तो यह कल्पना करना कठिन होगा कि ऐसी संस्था कैसे कार्य करेगी। भले ही किसी विशेष संस्थान में छात्रों की संख्या कम हो, फिर भी संस्थान के स्तर पर शैक्षणिक संस्थान के मामलों की देखरेख के लिए किसी व्यक्ति को अधिकार देना ही होगा। जब तक राज्य कोई ऐसा विश्वसनीय वैकल्पिक तंत्र लेकर नहीं आता जिसके तहत संस्थान प्रधानाध्यापक के बिना भी कार्य कर सके, तब तक हम यह मानने के पक्ष में हैं कि संस्थान में प्रधानाध्यापक का ऐसा पद बना रहेगा।
इस प्रकार प्रत्येक विद्यालय में प्रधानाध्यापक का पद अनिवार्य रूप से सृजित रहना चाहिए।
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