नई दिल्ली,। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में 30 फीसदी से अधिक का उछाल आया है जिसके चलते ज्यादातर देशों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की है। यह बढ़ोत्तरी 25-35 फीसदी के बीच हुई है।
भारत में अभी तक पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी की कीमतें नहीं बढ़ी हैं। लेकिन जिस प्रकार यह संकट बदस्तूर कायम है, उसके चलते सरकार के लिए आगे भी कीमतों पर काबू रख पाना संभव नहीं होगा। इसलिए यह अटकलें हैं कि अगले कुछ दिनों में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कुछ बढ़ोत्तरी हो सकती है। पेट्रोलियम उत्पादों के मामले में एक राहत की बात यह रही कि भारत करीब 41 देशों से इनकी खरीद कर रहा है जो अलग-अलग मार्ग से आते हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद सिंगापुर में पेट्रोल की कीमतें 30, नार्वे में 24, जर्मनी में 27, फ्रांस में 22, स्पेन में 34, जापान तथा साउथ कोरिया में 30 फीसदी तक बढ़ी हैं। रुपये में कीमतें देखें तो सिंगापुर में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 240,, नीदरलैंड में 225, जर्मनी में 205 रुपये के करीब बैठती है लेकिन भारत में लंबे समय से यह 95 रुपये पर स्थिर है।
पिछले महीने सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर से प्रति लीटर 10-10 रुपये उत्पाद शुल्क कम किया था। इससे पेट्रोलियम कंपनियों को फौरी राहत मिली थी लेकिन इस कटौती के बावजूद अप्रैल के आखिर तक उनका घाटा 30 हजार करोड़ रुपये पहुंच चुका था। दूसरी तरफ उत्पाद शुल्क में कटौती से सरकार को अप्रैल अंत तक 35 हजार करोड़ के राजस्व की चपत लगी है। इसके बावजूद सरकार को पेट्रोल पर प्रति लीटर 24 रुपये और डीजल पर 30 रुपये का घाटा हो रहा है।
एलपीजी के लिए अन्य देशों से खरीद शुरू
दूसरी तरफ एलपीजी की खरीद अरब देशों से ज्यादा होती थी और ज्यादातर आपूर्ति भी होर्मुज के रास्ते होती थी जिसके चलते एलपीजी की उपलब्धता घटी है। हालांकि अब भारत ने कई और देशों से भी एलपीजी की खरीद शुरू कर दी है। लेकिन लंबे रुट और मांग बढ़ने के कारण एलपीजी खरीद की लागत भी बढ़ी है। इसके बावजूद सरकार ने सिर्फ वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के लिए ही कीमतें बढ़ाई हैं, घेरलू उपभोक्ताओं पर अभी तक इसका बोझ नहीं डाला है।
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