सरप्लस शिक्षकों के तबादले का ‘FIFO’ फॉर्मूला: क्या है FIFO रूल और कैसे तय होती है आपकी स्कूल-जनपद की सीनियरिटी? – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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 सरप्लस शिक्षकों के तबादले का ‘FIFO’ फॉर्मूला: 

क्या है FIFO रूल और कैसे तय होती है आपकी स्कूल-जनपद की सीनियरिटी?

जो पहले आया, क्या वही सबसे पहले जाएगा?

पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के बेसिक शिक्षा विभागों में सरप्लस शिक्षकों (Surplus Teachers) के समायोजन (Adjustment) के लिए FIFO (First In, First Out) नियम का पालन किया जाता है। सरल शब्दों में कहें तो “जो पहले आया, वो पहले जाएगा।” इस नियम का मुख्य उद्देश्य छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) को संतुलित करना और स्कूलों में शिक्षकों की अधिकता को समाप्त करना है। आइए समझते हैं कि यह नियम स्कूल और जनपद स्तर पर वरिष्ठता (Seniority) और समायोजन को कैसे प्रभावित करता है।

1. FIFO नियम क्या है और यह कैसे काम करता है?

FIFO का पूरा नाम First In, First Out है। सरप्लस प्रक्रिया में इसका मतलब यह है कि जो शिक्षक वर्तमान विद्यालय में सबसे पहले नियुक्त या स्थानांतरित होकर आया था (यानी जिसकी उस स्कूल में सेवा अवधि सबसे लंबी है), उसे सबसे पहले सरप्लस माना जाएगा और उसी का तबादला दूसरे शिक्षक-विहीन या कम शिक्षक वाले स्कूल में किया जाएगा।

यह काम कैसे करता है? (एक उदाहरण से समझें)

मान लीजिए एक प्राथमिक विद्यालय में कुल 3 शिक्षक कार्यरत हैं, लेकिन छात्र संख्या घटने के कारण विभाग के नियमों के अनुसार वहां केवल 2 शिक्षकों की जरूरत है। ऐसे में 1 शिक्षक “सरप्लस” (अतिरिक्त) हो जाता है।

शिक्षक A: इस स्कूल में 2015 से कार्यरत हैं।

शिक्षक B: इस स्कूल में 2018 से कार्यरत हैं।

शिक्षक C: इस स्कूल में 2021 से कार्यरत हैं।

FIFO के तहत कार्रवाई: चूंकि शिक्षक A इस स्कूल में सबसे पहले (First In) आए थे, इसलिए स्कूल में सरप्लस होने पर उन्हें ही सबसे पहले बाहर (First Out) भेजा जाएगा। उनका स्थानांतरण किसी अन्य जरूरतमंद स्कूल में किया जाएगा।

2. स्कूल स्तर पर वरिष्ठता का निर्धारण (School Level Seniority)

स्कूल स्तर पर वरिष्ठता का निर्धारण पूरी तरह से शिक्षक द्वारा ‘वर्तमान विद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने की तिथि’ (Date of Joining in the Current School) के आधार पर किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि किसी शिक्षक की कुल सेवा अवधि चाहे कितनी भी अधिक हो, स्कूल स्तर पर उसकी वरिष्ठता केवल इसी बात से तय होगी कि उसने मौजूदा स्कूल में कब ज्वाइन किया था।

मूल विद्यालय में कार्यभार की तिथि: 

विद्यालय स्तर पर वरिष्ठता का निर्धारण शिक्षक की कुल सेवा अवधि के बजाय केवल ‘वर्तमान स्कूल में कार्यभार ग्रहण करने की तिथि’ (Date of Joining) से होता है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी शिक्षक की कुल नौकरी चाहे कितनी भी लंबी हो, वरिष्ठता की गणना इसी बात से तय होगी कि उसने मौजूदा विद्यालय में किस दिन ज्वाइन किया था।

अपवाद/विशेष परिस्थिति: 

यदि किसी विद्यालय में दो या दो से अधिक शिक्षकों की कार्यभार ग्रहण करने की तिथि बिल्कुल समान हो, तो यह एक विशेष परिस्थिति होती है। ऐसी स्थिति में वरिष्ठता निर्धारण के लिए शिक्षक की कुल सेवा अवधि (Total Service Length) को आधार बनाया जाता है। यदि कुल सेवा भी समान हो, तो जन्मतिथि के अनुसार उम्र में बड़े शिक्षक को वरिष्ठ माना जाता है।

3. जनपद स्तर पर वरिष्ठता का निर्धारण (District Level Seniority)

जब जनपद (District) स्तर पर सरप्लस शिक्षकों की सूची और उनके समायोजन की प्रक्रिया तैयार होती है, तो इसके नियम थोड़े व्यापक हो जाते हैं:

पूलिंग (Pooling): 

पूलिंग प्रक्रिया के अंतर्गत सर्वप्रथम जनपद के उन सभी विद्यालयों को चिन्हित किया जाता है, जहाँ आरटीई एक्ट के तय मानकों से अधिक शिक्षक तैनात हैं। इसके बाद, इन चिन्हित स्कूलों में ‘FIFO’ नियम लागू करके वहाँ के सबसे पुराने शिक्षक को ‘सरप्लस’ घोषित कर दिया जाता है। इस प्रकार बाहर किए गए सभी अतिरिक्त शिक्षकों को मिलाकर एक “जनपद स्तरीय सरप्लस पूल” तैयार किया जाता है।

काउंसलिंग और विकल्प: 

जनपद स्तर पर काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान सरप्लस शिक्षकों के सामने उन सभी विद्यालयों की सूची पारदर्शी रूप से प्रदर्शित की जाती है, जहाँ आरटीई मानकों के अनुसार शिक्षकों की कमी है। इसके बाद, शिक्षक अपनी सुविधानुसार रिक्त पदों वाले स्कूलों का विकल्प चुन सकते हैं, जिससे रिक्त चल रहे विद्यालयों को शिक्षक और सरप्लस शिक्षकों को नया तैनाती स्थल मिल जाता है।

मेरिट/वरिष्ठता क्रम: 

जब इन सरप्लस शिक्षकों को नया स्कूल चुनने का मौका दिया जाता है, तब उनकी “जनपद स्तर की कुल मौलिक नियुक्ति तिथि” (Date of Regular Appointment in the District) को देखा जाता है। जो शिक्षक जिले में सबसे पुराना है, उसे नया स्कूल चुनने का पहला मौका मिलता है।

4. FIFO नियम के लाभ और चुनौतियाँ

लाभ (Advantages)

पारदर्शिता: 

यह नियम पूरी तरह से पारदर्शी और निष्पक्ष है, क्योंकि इसमें ‘जॉइनिंग डेट’ के अकाट्य डेटा को ही एकमात्र आधार बनाया जाता है। डिजिटल डेटा पर आधारित होने के कारण इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के मानवीय हस्तक्षेप, व्यक्तिगत प्रभाव या भाई-भतीजावाद की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो जाती है और सभी शिक्षकों को समान न्याय मिलता है।

विवादों में कमी: 

इस नियम से कौन जाएगा और कौन रुकेगा, इसका गणित बिल्कुल साफ होता है। स्पष्ट डेटा आधारित होने के कारण शिक्षकों के बीच असमंजस की स्थिति नहीं रहती। परिणामतः, तबादलों और समायोजन को लेकर होने वाले आपसी मतभेद और कानूनी विवाद पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं।

चुनौतियाँ (Challenges)

वरिष्ठ शिक्षकों में नाराजगी: कई बार जो शिक्षक सालों से एक ही स्कूल में मेहनत कर रहे होते हैं, उन्हें सबसे पहले हटना पड़ता है, जबकि नए आए शिक्षक (जिन्होंने बाद में ज्वाइन किया) उसी स्कूल में सुरक्षित रह जाते हैं।

5. महत्वपूर्ण नीतिगत छूट (Exceptions)

आमतौर पर सरप्लस और FIFO प्रक्रियाओं में कुछ श्रेणियों को विभाग द्वारा सहानुभूति के आधार पर छूट दी जाती है (जैसे):

दिव्यांग शिक्षक/शिक्षिकाएं।

असाध्य या गंभीर बीमारी से ग्रसित शिक्षक।

महिला शिक्षक या ऐसी शिक्षिकाएं जिनके बच्चे बहुत छोटे हैं (यह नीति राज्य सरकार के तत्कालीन आदेशों पर निर्भर करती है)।

सरप्लस शिक्षकों के लिए FIFO नियम सीधे तौर पर “स्कूल में बिताए गए सबसे लंबे समय” को आधार बनाता है। स्कूल स्तर पर जो सबसे पुराना है, वो सरप्लस होगा; लेकिन जब नए स्कूल के आवंटन की बात आएगी, तब जिले की कुल सेवा के आधार पर उसे प्राथमिकता दी जाएगी।

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