लखनऊ। प्रदेश में पंचायत चुनावों में हो रही देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है कि आखिर प्रधानों के चुनाव कब तक कराए जाएंगे।
न्यायालय का कड़ा निर्देश
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराय और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने ओम्प्रकाश प्रजापति द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि 10 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर आयोग को चुनाव की तारीख बतानी होगी। साथ ही, सरकार को पंचायत चुनाव के मद्देनजर गठित ‘समर्पित अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग’ की रिपोर्ट भी उसी दिन पेश करने का निर्देश दिया गया है।
क्या है पूरा मामला?
प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों में प्रधानों के चुनाव होने हैं।
पंचायत कार्यकाल पूरा होने के बाद राज्य सरकार ने निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही उनकी पंचायतों में प्रशासक नियुक्त कर दिया था, जिसे याचिका में चुनौती दी गई है।
याची के वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने तर्क दिया कि उप्र पंचायत राज अधिनियम की धारा 12 के तहत प्रधानों का कार्यकाल शपथ लेने के बाद केवल पांच वर्ष का ही होता है।
याचिका में मांग की गई है कि यदि पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पा रहे हैं, तो पूर्व व्यवस्था के अनुसार किसी अन्य अधिकारी को प्रशासक नियुक्त किया जाना चाहिए।
10 जुलाई को स्थिति होगी साफ
सरकार ने आरक्षण निर्धारण के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया है, जिसे रिपोर्ट पेश करने के लिए छह माह का समय दिया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब सरकार को जल्द रिपोर्ट पेश करनी होगी। अब 10 जुलाई को होने वाली सुनवाई से ही यह तय हो पाएगा कि पंचायत चुनावों की तस्वीर क्या होगी।
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