NPS बैकलॉग कटौती पर फिर उठी आवाज, राज्यांश को GPF ब्याज सहित जमा करने की मांग तेज – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) से जुड़े कर्मचारियों के लंबित राज्यांश (State Share) और बैकलॉग कटौती का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस संबंध में टीम पहल उत्तर प्रदेश के संस्थापक एवं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व अधिवक्ता अनुराग सिंह ने वित्त विभाग के अधिकारियों के समक्ष नियुक्ति तिथि से NPS कटौती शुरू होने तक की अवधि का राज्यांश GPF ब्याज सहित NPS खाते में एकमुश्त जमा करने की मांग रखी है।

जानकारी के अनुसार, इस विषय पर वित्त नियंत्रक कार्यालय में वित्त एवं लेखाधिकारी तथा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी स्तर के अधिकारियों से वार्ता की गई। वार्ता के दौरान अधिकारियों ने कर्मचारियों की बात को गंभीरता से सुना, हालांकि राज्यांश को GPF ब्याज सहित NPS खाते में जमा करने के मुद्दे पर कुछ प्रशासनिक और वित्तीय बाधाओं का उल्लेख किया गया।

प्रस्तुत तर्कों के अनुसार, वर्ष 2019 के बाद शासन द्वारा अतिरिक्त फंड उपलब्ध न कराए जाने को इस समस्या का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। वहीं कर्मचारियों का कहना है कि यदि शासनादेश में विभिन्न विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं, तो कर्मचारियों को भी यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपनी कटौती से संबंधित उपयुक्त विकल्प का चयन कर सकें।

अनुराग सिंह ने कहा कि यदि इस मामले में शीघ्र समाधान नहीं निकला तो कर्मचारियों को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ सकता है। उनका कहना है कि “सत्य की खोज में जो भी रास्ता दिखेगा, उस पर जाना ही होगा।”

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि एक माह की सामान्य कटौती के साथ एक अतिरिक्त माह की बैकलॉग कटौती की व्यवस्था की जा सकती है। इससे किसी कर्मचारी पर अचानक वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा और समय के साथ पूरी लंबित कटौती भी जमा हो जाएगी, जो भविष्य में एक बड़े पेंशन फंड के निर्माण में सहायक होगी।

मुख्य मांगें

  • नियुक्ति तिथि से NPS कटौती प्रारंभ होने तक का राज्यांश NPS खाते में जमा किया जाए।

  • लंबित राशि पर GPF के बराबर ब्याज दिया जाए।

  • कर्मचारियों को उपलब्ध विकल्पों में से चयन का अधिकार मिले।

  • बैकलॉग कटौती के लिए व्यावहारिक और चरणबद्ध व्यवस्था लागू की जाए।

कर्मचारी संगठनों का मानना है कि इस विषय का समाधान जल्द निकाला जाना आवश्यक है, ताकि भविष्य में पेंशन संबंधी किसी प्रकार की जटिलता उत्पन्न न हो और कर्मचारियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

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