खंड शिक्षा अधिकारियों (बीईओ) को राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेजों में प्रधानाचार्य बनाने के मामले में पेंच फंस गया है। इसके लिए उत्तर प्रदेश शैक्षिक (सामान्य शिक्षा संवर्ग) सेवा नियमावली-1992 में संशोधन का प्रस्ताव फिलहाल रोक दिया गया है। शासन में उच्च स्तर पर राजकीय शिक्षक संघ (प्रवक्ता संवर्ग) की गंभीर आपत्तियों पर नए सिरे से विचार शुरू हो गया है।
नियमावली में संशोधन के विरोध में निदेशक उच्च शिक्षा को प्रत्यावेदन देने के बाद संघ ने हाईकोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने नियामवली में संशोधन से पहले प्रत्यावेदन पर विचार कर उसका निस्तारण करने का निर्देश दिया है। संघ की मांग है कि नियमावली में समूह ‘ख’ के उच्चतर पदों पर निर्धारित पदोन्नति कोटा से बेसिक शिक्षा विभाग के निरीक्षण शाखा के कर्मचारियों (बीईओ) को हटाया जाए। उसका कहना है कि राजकीय इंटर कॉलेज का प्रधानाचार्य का पद शैक्षिक संवर्ग एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग का पद है।
प्रधानाचार्य पद का 50 प्रतिशत पद सीधी भर्ती तथा 50 प्रतिशत पद पदोन्नति के माध्यम से भरा जाता है। भर्ती के लिए न्यूनतम तीन वर्ष का अध्यापन अनुभव अनिवार्य होता है। संघ के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. नित्य प्रकाश और प्रदेश महामंत्री डॉ. दिव्य रंजन त्रिपाठी ने निदेशक माध्यमिक शिक्षा को दिए प्रत्यावेदन में कहा था कि बीईओ बेसिक शिक्षा विभाग का निरीक्षण शाखा पद है। इस पद के लिए शैक्षिक अर्हता केवल स्नातक के साथ बीएड है, जबकि प्रधानाचार्य पद की शैक्षिक अर्हता परास्नातक के साथ बीएड है। इस तरह बीईओ अपेक्षित अर्हता नहीं रखते हैं और उनका विभाग भी माध्यमिक शिक्षा विभाग से अलग है।
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