नई दिल्ली, एएनआई: प्राइवेट स्कूलों की चकाचौंध में सरकारी स्कूलों की पूछ कम होती जा रही है। अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की चिंता में माता-पिता सरकारी स्कूलों की जगह प्राइवेट स्कूलों को महत्व दे रहे हैं। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट से कुछ ऐसी ही बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों में दाखिले में करीब 22 प्रतिशत की गिरावट आई है। 2005 में जहां 71 प्रतिशत दाखिले सरकारी स्कूलों में होते थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 49.24% रह गया।
2005 में 71 प्रतिशत दाखिले होते थे सरकारी स्कूलों में
2024-25 में दाखिला घटकर रह गया 49.24 प्रतिशत
भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली पर नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि अब सभी माध्यमिक संस्थानों में प्राइवेट स्कूलों की हिस्सेदारी 44.01 प्रतिशत हो गई है, जो निजी शिक्षा की ओर अभिभावकों के झुकाव को दर्शाता है। रिपोर्ट के अनुसार, यह बदलाव उस धारणा से प्रेरित है कि प्राइवेट स्कूल में बेहतर अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, अनुशासन और भविष्य में रोजगार के अच्छे अवसर मिलते हैं। रिपोर्ट आगाह करती है कि ऐसी उम्मीदें हमेशा जमीनी परिणामों से मेल नहीं खाती हैं। नीति आयोग ने कहा, “भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली में, खासतौर पर माध्यमिक स्तर पर, निजी संस्थानों की ओर उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। यह बदलाव बेहतर परिणामों के लिए अभिभावकों की आकांक्षाओं को दर्शाता है, लेकिन शिक्षा में प्राइवेट सेक्टर की तेज बढ़ोतरी ने गुणवत्ता, समानता और नियमन को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।” रिपोर्ट बताती है कि कम शुल्क वाले प्राइवेट स्कूलों की स्थिति चिंताजनक है। यहां कक्षा पांचवीं के 35% छात्र कक्षा दो की किताब पढ़ नहीं पाते, जबकि 60% छात्र बुनियादी भाग का सवाल हल नहीं कर पाते।
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