हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ खारिज लिख देने से प्रतीत होता है कि प्राधिकारी ने निर्णय लेते वक्त विवेक का उचित प्रयोग नहीं किया
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि स्थानांतरण नीति के तहत वैधानिक अभ्यावेदन पर संबंधित प्राधिकारी का कर्तव्य है कि उस पर विचार करे और अपना निर्णय गुणों के आधार पर दे। सिर्फ खारिज लिख देने से प्रतीत होता है कि उसने निर्णय के वक्त विवेक का उचित प्रयोग नहीं किया है।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकल पीठ ने सीआरपीएफ जवान माता प्रसाद सिंह का मथुरा से जम्मू-कश्मीर किया गया स्थानांतरण का आदेश रद्द कर दिया। याची का 22 दिसंबर 2025 को जारी आदेश से तबादला मथुरा की 16वीं बटालियन से उधमपुर, जम्मू-कश्मीर की 137वीं बटालियन में कर दिया गया था। याची ने स्थानांतरण नीति के पैरा-12 के अंतर्गत एक वैधानिक अभ्यावेदन प्रस्तुत किया था। हालांकि, संबंधित प्राधिकारी ने उसको 10 फरवरी 2026 को बिना कोई विस्तृत कारण बताए खारिज कर दिया था।
याची ने उसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। अधिवक्ता ने दलील दी कि याची के प्रत्यावेदन पर नियमों की अनदेखी कर आदेश पारित किया गया है। विवादित आदेश रद्द किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया है कि स्थानांतरण सेवा का एक हिस्सा है। किसी भी कर्मचारी को मनचाही जगह पर तैनाती का कोई निहित अधिकार नहीं है। हालांकि, वैधानिक अभ्यावेदन की स्थिति में सक्षम अधिकारी का यह कानूनी दायित्व है कि वह एक तर्कसंगत और सकारण आदेश पारित करे।
ऐसे में कोर्ट ने संतोष कुमार पाल बनाम भारत संघ के मामले में पूर्व में दिए गए कानूनी सिद्धांतों का भी संदर्भ लिया। याचिका को स्वीकार कर प्रतिवादी संबंधित अधिकारी के 10 फरवरी 2026 को पारित पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। साथ ही संबंधित प्राधिकारी को आदेश दिया है कि वे याची के अभ्यावेदन पर कानून के अनुसार व पूर्व में स्थापित न्यायिक निर्णयों को ध्यान में रखते हुए दो सप्ताह में नया और विस्तृत आदेश जारी करें
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