नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट कम छात्रों वाले 100 से अधिक प्राइमरी स्कूलों को दूसरे विद्यालयों में विलय करने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले के खिलाफ सुनवाई करने पर सहमत हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले को इसी सप्ताह सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है। हालांकि जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, यह नीतिगत फैसला है, लेकिन सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं तो वह इस मुद्दे की सुनवाई के लिए तैयार हैं। याचिकाकर्ता तैय्यब खान सलमानी की ओर से पेश अधिवक्ता प्रदीप यादव ने तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया था।
यादव ने कहा कि 16 जून को राज्य के बेसिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की ओर से जारी अधिसूचना में बेसिक शिक्षा अधिकारियों को सरकारी प्राथमिक विद्यलायों का अन्य सरकारी स्कूलों में विलय करने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप जिन स्कूलों का विलय किया जा रहा है, उनकी संख्या 105 है और उनकी सूची जारी की गई है। यादव ने कहा कि राज्य सरकार के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने सात जुलाई को मामले के वास्तविक तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किए बिना याचिकाओं को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट में सीतापुर और पीलीभीत के 51 छात्रों ने शासनादेश के खिलाफ याचिकाएं दायर की थी। अधिसूचना के मुताबिक, राज्य के दूरदराज में स्थित जिन सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 70 या इससे कम छात्र होंगे, उनका आसपास के अन्य विद्यालयों में विलय कर दिया जाएगा।
राज्य सरकार का निर्णय मनमाना
याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के स्कूलों के विलय करने के निर्णय को मनमाना बताया है। दावा किया है कि स्कूलों के विलय की प्रक्रिया के कारण बच्चों को एक किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ेगा, जो कथित तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21ए और बच्चों के मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई), 2009 का उल्लंघन है।
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