विद्यालयों के एकीकरण की प्रक्रिया को प्रशासन भले ही गुणवत्ता सुधार, संसाधनों का समायोजन और शिक्षकों की उपलब्धता जैसे तथाकथित तार्किक तर्कों से सही ठहराए, परंतु यह शिक्षा के अधिकार अधिनियम की आत्मा पर सीधा प्रहार है। यह अधिनियम केवल किसी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि संविधान की वह संवेदनशील अभिव्यक्ति है, जो कहती है कि हर बच्चा जहां है, वहीं शिक्षा उसका अधिकार है।
जब स्कूल नज़दीक होता है, तो बच्चा सिर्फ़ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि एक आत्मविश्वास, एक संबंध, एक पहचान के लिए स्कूल जाता है। गांव के ही स्कूल में पहली बार क, ख, ग पकड़ने वाला बच्चा सिर्फ़ पाठ्यक्रम नहीं सीखता, वह दुनिया से जुड़ता है, वह समाज में अपना स्थान देखना शुरू करता है। ऐसे में जब केवल सुविधाओं की बात कर, सुलभता की बलि दी जाती है, तो नीति की आत्मा वहीं दम तोड़ देती है।
शिक्षा कोई आंकड़ों का खेल नहीं, यह सामाजिक न्याय का ज़मीन से जुड़ा संघर्ष है। एक ऐसा स्कूल, जिसकी दीवारें भले ही पुरानी हों, लेकिन जो पास हो, उस बच्चे के जीवन का सबसे ठोस आधार बन सकता है, जिसकी दुनिया वहीं से शुरू होती है। यह एक मनोवैज्ञानिक और शैक्षिक सत्य है कि छोटे बच्चों के लिए दूरी स्वयं में एक अवरोध बन जाती है। लड़कियों के लिए, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, यह दूरी बहुत बार स्कूल न जाने का स्थायी कारण बन जाती है। इसलिए नीति निर्धारकों को चाहिए कि वे स्कूलों के एकीकरण से पहले बच्चों के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षिक हितों पर विचार करें।
भले ही संसाधन कम हों, पर अगर स्कूल नज़दीक है, तो शिक्षा की पहुंच बनी रहती है। यही शिक्षा का पहला मूल्य है—पहुँच। “स्कूल बड़ा नहीं, पास होना चाहिए”—यह कोई नारा नहीं, बल्कि संविधान की बुनियादी संवेदना है, जिसे आंकड़ों से नहीं, बच्चों की आंखों से देखा जाना चाहिए।
प्रवीण त्रिवेदी
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