कानपुर देहात। परिषदीय प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों को कम छात्र संख्या के आधार पर अन्य विद्यालयों में विलय करने के आदेश के खिलाफ प्रदेश भर में विरोध तेज हो गया है। शिक्षकों का कहना है कि सरकार का यह कदम समाज के सबसे कमजोर वर्ग के बच्चों के भविष्य और उनके मौलिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है। आरटीई अधिनियम के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। विद्यालय बंद होने से बच्चे शिक्षा से वंचित होंगे।
इसी को लेकर शिक्षक हिमांशु राणा ने दिल्ली के वरिष्ठ अधिवक्ताओं से गहन कानूनी चर्चा की और सरकार के इस निर्णय को चुनौती देने की रूपरेखा तैयार की है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारी होने के नाते शिक्षक स्वयं याचिकाकर्ता नहीं बन सकते, लेकिन वे अभिभावकों के माध्यम से इस लड़ाई को आगे ले जाएंगे।
संगठित रणनीति के लिए शिक्षक और अभिभावक मिलकर उतरें मैदान में
राणा ने शिक्षकों से आह्वान किया है कि वे उन अभिभावकों से संपर्क करें जिनके बच्चों का विद्यालय मर्ज होने के बाद बहुत दूर चला गया है। उन्होंने आग्रह किया कि ऐसे मामलों में बच्चों और अभिभावकों का नाम, आधार कार्ड, पूर्व और नए विद्यालय का नाम, दूरी, और सहमति-पत्र जैसी जानकारी जुटाई जाए ताकि उसे कोर्ट कार्यवाही में उपयोग किया जा सके। राणा ने यह भी कहा कि अलग-अलग कोर्ट केस लड़ने की बजाय सभी लोग संगठित होकर एकजुट याचिका दायर करें। यह किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि बेसिक शिक्षा को बचाने की सामूहिक लड़ाई है। उन्होंने चेताया कि यदि आज चुप रहे तो हर सत्र में विद्यालय बंद होंगे और आउटसोर्सिंग को बढ़ावा मिलेगा। यह समायोजन और स्थानांतरण का भ्रम फैलाकर शिक्षकों को गुमराह करने का प्रयास है। अंत में उन्होंने कहा कि जल्द ही लखनऊ या इलाहाबाद में अधिवक्ताओं से मिलकर अगली कानूनी कार्यवाही की जाएगी और हर शिक्षक को अब जिम्मेदारी समझते हुए एकजुट होना होगा।
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