दैनिक वेतनभोगियों को न्यूनतम वेतनमान देने से इनकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया ₹1 लाख का जुर्माना
प्रयागराज | उत्तर प्रदेश समाचार
उत्तर प्रदेश के वन विभाग में कार्यरत दैनिक वेतनभोगियों को न्यूनतम वेतनमान देने से इनकार करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव एवं न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने सरकार की दो विशेष अपीलें खारिज करते हुए ₹1 लाख का जुर्माना लगाया है।
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, सोनभद्र के ओबरा वन प्रभाग में जुलाई 2009 से चौकीदार, वाचर एवं प्रभारी के रूप में कार्यरत रमेश और उमेश को मात्र ₹6,162 प्रतिमाह वेतन दिया जा रहा था। वहीं, वन विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का न्यूनतम वेतनमान ₹18,000 प्रतिमाह बताया गया है।
याचियों की ओर से अधिवक्ता पंकज श्रीवास्तव ने दलील दी कि लंबे समय से विभाग में काम करने के बावजूद कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का लाभ नहीं दिया जा रहा था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
एकल पीठ ने जुलाई माह में आदेश दिया था कि संबंधित कर्मचारियों को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के न्यूनतम वेतनमान के अनुसार भुगतान किया जाए। हालांकि, आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया था कि उन्हें भत्ते और वेतनवृद्धि का लाभ नहीं मिलेगा।
राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ विशेष अपील दाखिल करते हुए दलील दी कि 24 सितंबर 2024 के दिशा-निर्देशों के अनुसार याची लाभ पाने के पात्र नहीं हैं। सरकार का यह भी कहना था कि संबंधित कर्मचारी मौसमी आधार पर कुछ समय के लिए कार्यरत थे और उनके लिए कोई स्वीकृत पद उपलब्ध नहीं था।
हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने सुनवाई का अवसर दिए बिना अंतरिम चरण में ही राहत देने के मामले पर भी विचार किया और दोनों विशेष अपीलें खारिज कर दीं।
कर्मचारियों के लिए क्या है इसका महत्व?
यह मामला दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के वेतन और न्यूनतम वेतनमान से जुड़े विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस आदेश को सभी दैनिक वेतनभोगियों पर स्वतः लागू नहीं माना जा सकता। इसका लाभ संबंधित मामले के तथ्यों और न्यायालय के आदेश के दायरे के अनुसार ही निर्धारित होगा।
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