इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि स्पेशल बीटीसी ट्रेनिंग कोर्स 2004 के लिए चयनित अभ्यर्थी प्रशिक्षण शुरू होने से लेकर नियुक्ति की तिथि तक ढाई हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय पाने के वैधानिक हकदार हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने दिया है। इसी के साथ कोर्ट ने राज्य सरकार के 14 मई 2015 के उस शुद्धिपत्र को रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से मानदेय को केवल प्रशिक्षण अवधि तक सीमित करने का प्रयास किया गया था।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 14 जनवरी 2004 के मूल शासनादेश में अभ्यर्थियों को नियुक्ति तक मानदेय देने का स्पष्ट प्रावधान था, जिसे राज्यपाल की मंजूरी से जारी किया गया था। सरकार द्वारा बाद में जारी किया गया शुद्धिपत्र केवल विभागीय स्पष्टीकरण नहीं था बल्कि यह अभ्यर्थियों के अर्जित अधिकारों और वित्तीय लाभों में कटौती करने वाला बड़ा नीतिगत बदलाव था। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी भी ऐसे नीतिगत निर्णय को बदलने के लिए अनुच्छेद 166 के तहत निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है और इसे महज एक शुद्धिपत्र के माध्यम से संशोधित नहीं किया जा सकता।
यह विवाद तब गहराया था, जब अश्वनी कुमार अवस्थी और अन्य अभ्यर्थियों के मानदेय दावों को सरकार ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि संशोधित नियमों के तहत अब मानदेय केवल ट्रेनिंग की अवधि तक देय है। याचियों ने दलील दी थी कि उन्होंने मूल शासनादेश के भरोसे ही प्रशिक्षण पूरा किया था, जिससे उनमें वैध अपेक्षा उत्पन्न हुई थी जिसे सरकार पूर्वव्यापी प्रभाव से खत्म नहीं कर सकती।
कोर्ट ने यह भी संज्ञान लिया कि इस मामले में पूर्व में हुए मुकदमों में सुप्रीम कोर्ट तक ने अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला सुनाया था और मानदेय की पात्रता को सही ठहराया था। हाईकोर्ट ने सरकार के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि स्पष्टीकरण केवल त्रुटियों को सुधारने के लिए होता है, न कि मूल नीति को दोबारा लिखने या अधिकारों को कम करने के लिए। इसी के साथ कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि अभ्यर्थियों के बकाया मानदेय का भुगतान चार महीने के भीतर सुनिश्चित करें।
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