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 150 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को हाईकोर्ट से मिली राहत का दायरा सीमित, वरिष्ठ शिक्षक समायोजन पर फिर उठे सवाल

उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा विभाग में प्रधानाध्यापकों (हेडमास्टर/हेडमिस्ट्रेस) के समायोजन को लेकर वर्ष 2024 में काफी विवाद हुआ था। विभाग की नीति के अनुसार, जिन प्राथमिक विद्यालयों में 150 से कम छात्र थे, वहाँ कार्यरत प्रधानाध्यापकों को अधिशेष (सरप्लस) मानकर समायोजित किया जा रहा था। जनपद के प्रधानाध्यापक की सूची से उसमें से कनिष्ठ प्रधानाध्यापकों को उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक के पद पर तथा 150 से अधिक छात्र संख्या वाले प्राथमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापक के पद पर समायोजित करने की प्रक्रिया चल रही थी।

इस नीति के विरुद्ध आलोक गिरी एवं अन्य याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में रिट याचिका संख्या 7452 ऑफ 2024 दायर की। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रधानाध्यापक का पद शिक्षक की परिभाषा के अंतर्गत आता है। उन्होंने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (शिक्षक) (पोस्टिंग) नियमावली, 2008 का हवाला देते हुए कहा कि हेडमास्टर/हेडमिस्ट्रेस भी शिक्षक ही हैं क्योंकि वे स्कूल में शिक्षा प्रदान करते हैं। RTE Act 2009 की अनुसूची में 150 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के लिए अलग से हेड टीचर का पद अनिवार्य नहीं है, इसलिए उन्हें शिक्षक से अलग वर्गीकृत करके अधिशेष मानना मनमाना और अनुचित है।

माननीय न्यायमूर्ति श्री मनीष माथुर की एकलपीठ ने 5 सितंबर 2024 को याचिका पर सुनवाई करते हुए परिपत्र दिनांक 16.08.2024 के पैराग्राफ 2 के उस प्रावधान को स्थगित कर दिया, जिसमें 150 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के प्रधानाध्यापकों को अनिवार्य रूप से अधिशेष मानकर समायोजित करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों में प्रथम दृष्टया बल पाया और सरकार को उत्तर दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया।

वर्तमान में जब वरिष्ठ शिक्षक/शिक्षिकाओं का समायोजन प्रक्रिया चल रही है, तब कई प्रधानाध्यापक इस भ्रम में हैं कि 5 सितंबर 2024 का उच्च न्यायालय का अंतरिम आदेश उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान कर रहा है। वास्तविकता यह है कि उक्त रोक केवल 150 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के प्रधानाध्यापकों को अधिशेष मानने वाले प्रावधान पर थी। क्योंकि वह स्वयं को अध्यापक बताकर स्कूल में वरिष्ठ शिक्षक के दायरे में आ रहे थे और वह भी स्वयं को शिक्षक के रूप में गिनवाना चाहते थे। यह रोक अन्य प्रावधानों या पूर्ण समायोजन नीति पर नहीं लगी थी। अब नई प्रक्रिया में वरिष्ठता के आधार पर समायोजन हो रहा है, इसलिए पुरानी रोक का दायरा सीमित है। क्योंकि वरिष्ठ शिक्षक के रूप में वह वर्तमान में सरप्लस के दायरे में हैं। 

अधिशेष प्रधानाध्यापकों के समायोजन के विकल्प निम्नलिखित हो सकते हैं। 

– एकल शिक्षक प्राथमिक विद्यालय (Single Teacher School) या प्रधानाध्यापक विहीन प्राथमिक विद्यालयों में।

– जिन प्राथमिक विद्यालयों में 150 से अधिक छात्र हैं और वहाँ प्रधानाध्यापक का पद रिक्त है।

– आवश्यकता अनुसार उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक के पद पर , बशर्ते कि वह उच्च प्राथमिक स्तर की टीईटी उत्तीर्ण हों। 

यह समायोजन RTE Act 2009 के छात्र-शिक्षक अनुपात के मानकों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है।

2024 का उच्च न्यायालय का आदेश याचिकाकर्ताओं को अस्थायी राहत अवश्य प्रदान करता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। विभाग का प्रयास छात्र-शिक्षक अनुपात को सही रखना और रिक्त पदों को भरना है। 

150 से कम बच्चों के विद्यालय में खुद को अध्यापक सिद्ध करके स्थगन पाने वाले प्रधानाध्यापक अब वरिष्ठ शिक्षक शिक्षिकाओं का समायोजन होने पर खुद को क्या सिद्ध करके स्थगन से बचना चाहते है। इसलिए 150 से कम बच्चों पर किसी प्रधानाध्यापक को सरप्लस के दायरे से हटाकर किसी सहायक अध्यापक को उनके स्थान पर सरप्लस नहीं किया जा सकता है। 

जबकि RTE ACT के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार वर्ष 2025 में 150 से कम बच्चों के स्कूल में प्रधानाध्यापक का पर शून्य करके पर्यवेक्षक का पद सृजित कर चुकी है। 

RAHUL PANDEY AVICHAL

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