महिला होने पर नौकरी नहीं देना नारीत्व का अपमान : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महज महिला होने के आधार पर एक महिला को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन आयल कॉर्पोरेशन में नौकरी नहीं दिए जाने को ‘नारीत्व का अपमान’ बताया। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इंडियन आयल को याचिकाकर्ता महिला (सुमित्रा) को 12 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
जस्टिस कुमार ने कहा कि अब वह सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच चुकी हैं, पर लगातार अपने अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी है। ऐसे में एकमुश्त मुआवज दिया जाए। उन्होंने कहा कि हम भारत से हैं और हर दिन हम कहते हैं कि महिलाओं का सम्मान करें। हम कह सकते हैं कि यह नारीत्व का अपमान है और वह भी भारत सरकार के एक उपक्रम द्वारा। शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाएं रोज अपने घरों में गैस सिलेंडर उठाती हैं। जब पुरुष नहीं होते, तो वही सिलेंडर बदलती हैं।
कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नियुक्ति के लिए नामों की सूची सिर्फ सिफारिश थी। अधिकारियों को वह उपयुक्त नहीं लगी होगी क्योंकि इस नौकरी में शारीरिक मेहनत की जरूरत होती है। हेल्पर को सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और नाइट शिफ्ट में भी ड्यूटी करनी होती है। इस पर पीठ ने कहा कि आप (कंपनी) यह सोचते हैं कि महिला सिलेंडर नहीं उठा सकती? यदि आप यह सोचते हैं तो इसे बदलने की जरूरत है।
हरियाणा के गुढ़ा गांव की सुमित्रा उन 49 लोगों में थीं, जिनकी सिफारिश एक स्थानीय समिति ने एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए की थी, पर उन्हें नौकरी नहीं दी गई थी।
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