सेवानिवृत्त कर्मी से वर्षों बाद वेतन विसंगति के नाम पर वसूली अवैध – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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हाई कोर्ट ने कहा, यह दमनकारी, रद्द किया एसएसपी झांसी का आदेश

, प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद वर्षों पहले हुई किसी कथित वेतन निर्धारण त्रुटि को आधार बनाकर वेतनमान में कटौती करना या वसूली की कार्रवाई करना पूरी तरह से अवैध और दमनकारी है। ऐसी कार्रवाई न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के स्थापित न्यायिक मानदंडों का भी खुला उल्लंघन है। न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकलपीठ ने यह टिप्पणी दिग्विजय सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए की है। याची ने झांसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के 10 अप्रैल 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत वर्ष 2008 से उनके वेतनमान को संशोधित कर कटौती और वसूली का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने एसएसपी का आदेश पूरी तरह निरस्त कर दिया है।

मामले पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि याची को अपनी बात रखने या सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पंजाब राज्य बनाम रफ़ीक मसीह (व्हाइट वाशर) मामले में दिए गए उस ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों या श्रेणी तीन व चार के कर्मचारियों से किसी भी प्रकार की वसूली नहीं की जा सकती, बशर्ते उनकी ओर से कोई धोखाधड़ी या गलत तथ्य पेश न किए गए हों। सरकार अपने अन्य सभी लाभों का निर्धारण उनके द्वारा अंतिम बार प्राप्त किए गए वेतन (लास्ट पे ड्रा) के आधार पर सुनिश्चित करें।

सार्वजनिक उपक्रम के खिलाफ याचिका पोषणीय नहीं : कोर्ट

प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि यदि किसी सरकारी संस्थान अथवा सार्वजनिक उपक्रम का निजीकरण हो जाता है तो उसके खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर नहीं की जा सकती। ऐसी याचिका पोषणीय नहीं है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए वर्ष 2000 से लंबित याचिका इसी आधार पर खारिज कर दी है। याची को छूट दी है कि वह श्रम अदालत में जा सकता है, क्योंकि 25 साल से याचिका लंबित रही इसलिए वाद दायर करने में हुई देरी क्षम्य होगी।

शासनादेश (16 जनवरी 2007) के अनुसार भी सेवानिवृत्ति से पहले हुई वेतन निर्धारण की किसी गलती के लिए बाद में न तो वेतन की वसूली की जा सकती है और न ही पेंशन को कम किया जा सकता है। न्यायालय ने माना कि इस तरह की एकतरफा कार्रवाई कर्मचारी के नागरिक व मौलिक अधिकारों पर गहरा आघात करती है। अदालत ने प्रतिवादियों को आदेश दिया है कि वे याची की पेंशन और सेवानिवृत्ति के वसूली आदेश पर प्रमुख सचिव गृह व वित्त नियंत्रक पीएचक्यू से मांगा हलफनामा : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रमुख सचिव गृह व वित्त नियंत्रक पुलिस मुख्यालय लखनऊ से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि अधिक वेतन भुगतान की सेवानिवृत्ति के बाद वसूली पर रोक लगाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए हैं।

यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने प्रयागराज निवासी गिरधारी लाल की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सुशील कुमार सिंघल केस (2014) में 16 जनवरी 2007 के शासनादेश के तहत अधिक वेतन भुगतान की सेवानिवृत्ति परिलाभों से वसूली पर रोक लगा रखी है। इसके बावजूद प्रतिदिन ऐसे मामले कोर्ट में आ रहे हैं। अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन नहीं कर रहे। मामले में अगली सुनवाई 25 मई को होगी। याची के लिए अधिवक्ता बीएन सिंह राठौर ने बहस की। कहा, वित्त नियंत्रक पुलिस मुख्यालय लखनऊ ने सेवानिवृत्त होने के बाद अधिक वेतन भुगतान की वसूली कर ली। याची को परिलाभों का भुगतान करने से इन्कार कर दिया। यह आदेश न केवल अवैध है अपितु सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन भी है।

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