डिजिटल भुगतान को और सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उटाया जा रहा है। फर्जीवाड़े को रोकने के लिए राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने एआई आधारित नई प्रणाली का पायलट परीक्षण शुरू किया है। इस नई तकनीक की मदद से धोखाधड़ी कर लोगों के बैंक खातों से निकाली गई रकम को अन्य खातों में पहुंचते ही ट्रैक किया जा सकेगा।
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यदि यह परीक्षण सफल रहा तो बैंक पैसे को अलग-अलग खातों में पूरी तरह पहुंचने से पहले ही रोक सकेंगे। सूत्रों के अनुसार, इस पायलट परियोजना के लिए एक दर्जन बैंकों को चुना गया है। प्रत्येक बैंक अपनी लेनदेन प्रणाली पर एनपीसीआई द्वारा विकसित एआई मॉडल चलाएगा, जो हर लेनदेन का जोखिम स्कोर तैयार करेगा।
यदि कोई लेनदेन संदिग्ध पाया जाता है, तो एनपीसीआई तुरंत यह पता लगाएगा कि पैसा किन-किन खातों में भेजा जा रहा है। अगर रकम बहुत तेजी से कई खातों में भेजी जा रही है तो सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी करेगा। जरूरत पड़ने पर रकम पूरी तरह गायब होने से पहले उसे रोकने की कार्रवाई की जा सकेगी। मौजूदा व्यवस्था में जब तक पीड़ित व्यक्ति बैंक या पुलिस में शिकायत दर्ज कराता है, तब तक ठग पैसा कई खातों में भेज चुके होते हैं। ऐसे में रकम वापस लाना कठिन हो जाता है।
डाटा रहेगा सुरक्षित : यह प्रणाली अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है। इसमें ग्राहकों का व्यक्तिगत बैंकिंग डाटा किसी केंद्रीय सर्वर पर नहीं भेजा जाएगा। हर बैंक अपने यहां ही एआई मॉडल चलाएगा और केवल जोखिम से जुड़ी जानकारी एनपीसीआई के साथ साझा करेगा। इससे ग्राहकों की गोपनीयता भी सुरक्षित रहेगी।
जालसाजों के म्यूल खातों पर होगी नजर
साइबर ठग आमतौर पर चोरी की रकम को छिपाने के लिए उसे कई बैंक खातों (म्यूल अकाउंट) में तेजी से भेजते हैं। इससे पैसा ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। नया एआई मॉडल ऐसे नेटवर्क की पहचान कुछ ही सेकेंड में कर सकेगा और रकम पूरी तरह इधर-उधर होने से पहले कार्रवाई की जा सकेगी। म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते होते हैं, जो गैरकानूनी गतिविधियों से पैसा हासिल करने और उसे आगे भेजने का जरिया बनते हैं।
देश में लगातार बढ़ रहे साइबर ठगी के मामले
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में साइबर ठगी के 28.15 लाख मामले दर्ज किए गए, जो 2024 के 22.68 लाख मामलों की तुलना में 24% अधिक हैं। 2025 में सामने आए मामलों में भारतीयों को ₹22,495 करोड़ का नुकसान हुआ। वहीं, 2020 से 2025 के बीच देश में साइबर ठगी से 65 लाख से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं।
पहले से भी चल रहे हैं एआई आधारित प्रयास
डिजिटल धोखाधड़ी रोकने के लिए के आरबीआई इनोवेशन हब ने भी Mule Hunter.ai नामक एआई आधारित प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो संदिग्ध मनी म्यूल खातों की पहचान करने में बैंकों की मदद करता है। इसे साइबर अपराध से जुड़े डाटाबेस के साथ जोड़ने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं।
नई दिल्ली, एजेंसी। डिजिटल भुगतान को और सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उटाया जा रहा है। फर्जीवाड़े को रोकने के लिए राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने एआई आधारित नई प्रणाली का पायलट परीक्षण शुरू किया है। इस नई तकनीक की मदद से धोखाधड़ी कर लोगों के बैंक खातों से निकाली गई रकम को अन्य खातों में पहुंचते ही ट्रैक किया जा सकेगा।
यदि यह परीक्षण सफल रहा तो बैंक पैसे को अलग-अलग खातों में पूरी तरह पहुंचने से पहले ही रोक सकेंगे। सूत्रों के अनुसार, इस पायलट परियोजना के लिए एक दर्जन बैंकों को चुना गया है। प्रत्येक बैंक अपनी लेनदेन प्रणाली पर एनपीसीआई द्वारा विकसित एआई मॉडल चलाएगा, जो हर लेनदेन का जोखिम स्कोर तैयार करेगा।
यदि कोई लेनदेन संदिग्ध पाया जाता है, तो एनपीसीआई तुरंत यह पता लगाएगा कि पैसा किन-किन खातों में भेजा जा रहा है। अगर रकम बहुत तेजी से कई खातों में भेजी जा रही है तो सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी करेगा। जरूरत पड़ने पर रकम पूरी तरह गायब होने से पहले उसे रोकने की कार्रवाई की जा सकेगी। मौजूदा व्यवस्था में जब तक पीड़ित व्यक्ति बैंक या पुलिस में शिकायत दर्ज कराता है, तब तक ठग पैसा कई खातों में भेज चुके होते हैं। ऐसे में रकम वापस लाना कठिन हो जाता है।
डाटा रहेगा सुरक्षित : यह प्रणाली अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है। इसमें ग्राहकों का व्यक्तिगत बैंकिंग डाटा किसी केंद्रीय सर्वर पर नहीं भेजा जाएगा। हर बैंक अपने यहां ही एआई मॉडल चलाएगा और केवल जोखिम से जुड़ी जानकारी एनपीसीआई के साथ साझा करेगा। इससे ग्राहकों की गोपनीयता भी सुरक्षित रहेगी।
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